01रघुजी और पूर्व के धावे
रघुजी प्रथम ने शाहू के अधीन बरार सँभाला और देवगढ़ के गोंड राजाओं के उत्तराधिकार-झगड़े में पड़कर 1740 के दशक के आरम्भ तक नागपुर को अपनी राजधानी बना लिया। 1742 से उनके सेनापति भास्कर पण्डित हर वर्ष बंगाल पर घुड़सवार धावे ले गए। इन धावेदारों, बरगियों, ने पश्चिमी बंगाल में गाँव के गाँव जलाए, और बंगाली लोरियाँ आज भी बच्चों को उन्हीं से डराती हैं; कवि गंगाराम का 1751 का ‘महाराष्ट्र पुराण’ उस आतंक का वर्णन करता है। 1751 में नवाब अलीवर्दी ख़ान ने ओडिशा का राजस्व देकर और बंगाल की चौथ भरकर शान्ति खरीदी। 1755 में रघुजी का देहान्त हुआ।
02नागपुर के अधीन ओडिशा
आधी शताब्दी तक ओडिशा पर नागपुर से, कटक में बैठे सूबेदार के द्वारा, राज हुआ, और बाराबाटी किला उसका आसन था। मराठा सूबेदारों ने पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का प्रबन्ध अपने हाथ में लिया और उसके अनुष्ठानों और मरम्मत का ख़र्च उठाया। नागपुर के राजाओं ने रामटेक की पहाड़ी के मन्दिरों को भी दान दिए, जहाँ माना जाता है कि वनवास में श्रीराम ठहरे थे।

03पराजय और विलय
1803 में रघुजी द्वितीय ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध दौलतराव सिन्धिया का साथ दिया और असई और अड़गाँव में हारे। दिसम्बर 1803 की देवगाँव सन्धि में ओडिशा और पश्चिमी बरार छिन गए। उनके भतीजे अप्पासाहेब ने नवम्बर 1817 में अंग्रेज़ रेज़िडेण्ट पर हमला किया और नागपुर की सीताबर्डी पहाड़ी पर हारे। फिर बालक रघुजी तृतीय को गद्दी पर बिठाया गया, और 1853 में उनके निस्सन्तान मरने पर लॉर्ड डलहौज़ी ने व्यपगत के सिद्धान्त के नाम पर नागपुर हड़प लिया। घराने के रत्न और सामान महल के आँगन में नीलाम हुए।
शासक
- 1रघुजी प्रथमसंस्थापक; 1751 में बंगाल से ओडिशाc. 1739–1755
- 2जानोजी1755–1772
- 3साबाजी1772–1775
- 4मुधोजी प्रथम1775–1788
- 5रघुजी द्वितीयदेवगाँव सन्धि में ओडिशा गया1788–1816
- 6परसोजी1816–1817
- 7मुधोजी द्वितीय (अप्पासाहेब)सीताबर्डी में पराजय1817–1818
- 8रघुजी तृतीयउनके बाद नागपुर का विलय1818–1853
उनकी विरासत
- मध्य भारत की राजधानी के रूप में नागपुर
- रामटेक के राम मन्दिरों को दान
- पचास वर्ष तक पुरी के जगन्नाथ मन्दिर की मराठा देखरेख




