01कूडलसंगम और कल्याण
उनका जन्म बीजापुर क्षेत्र के बागेवाड़ी में हुआ और शिक्षा कूडलसंगम में, जहाँ कृष्णा और मलप्रभा मिलती हैं। कल्याण में वे बिज्जल के मंत्री बने। उनका घर अनुभव मण्टप बना, एक सभा जहाँ हर जन्म और हर पेशे के शरण, कुम्हार, धोबी, मोची, ब्राह्मण, स्त्री और पुरुष, अक्क महादेवी और अल्लम प्रभु जैसे, सरल कन्नड़ में शिव की चर्चा करते। हर शरण शरीर पर इष्टलिंग धारण करता और नित्य उसकी पूजा करता।
02कायक ही कैलास
बसव ने कहा कि हर शरण ईमानदार श्रम, कायक, से जिए और जो कमाए उसे बाँटे, दासोह। ‘कायकवे कैलास’, श्रम ही कैलास है, यह कहावत इसी मण्डली से निकली। समुदाय में जन्म की रेखाएँ लाँघने वाले एक विवाह से कल्याण में उथल-पुथल हुई, और बसव नगर छोड़कर कूडलसंगम लौट आए, जहाँ उन्होंने देह त्यागी। नदियों के संगम पर उनका समाधि-स्थल है। बसव जयंती वैशाख शुक्ल तृतीया, अक्षय तृतीया, को मनाई जाती है।

“धनी लोग शिवालय बनाएँगे, मैं निर्धन क्या करूँ? मेरे पैर ही खम्भे हैं, देह ही देवालय, सिर ही सोने का कलश। सुनो, हे कूडलसंगमदेव: जो स्थावर है वह ढह जाएगा, जो जंगम है वह सदा रहेगा।”
Vachana of Basavanna, tr. A. K. Ramanujan, Speaking of Siva (1973)

