चित्र: Unknown photographer · Public domain
स्वतंत्रता सेनानी

बिरसा मुंडा

धरती आबा, उलगुलान के नायक

1875 ई.—1900 ई.

15 नवंबर 1875 – 9 जून 1900

छोटानागपुर के युवा मुंडा, जिन्होंने अपने लोगों को अपनी आस्था और अपनी धरती की ओर लौटने को पुकारा और 1899–1900 के महान विद्रोह ‘उलगुलान’ का नेतृत्व किया। चौबीस वर्ष की आयु में रांची जेल में उनका देहांत हुआ।

01धरती आबा

उनका जन्म आज के झारखंड के खूँटी ज़िले के उलिहातु गाँव में एक निर्धन मुंडा परिवार में हुआ। परिवार ईसाई बन चुका था, और उन्होंने चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में पढ़ाई की, फिर मिशन छोड़ दिया। कुछ समय वैष्णव गुरु आनंद पांडे के साथ रहे और रामायण-महाभारत सुनी। लगभग 1895 से वे उपदेश देने लगे: एक भगवान, शराब नहीं, आत्माओं को पशुबलि नहीं, शुद्ध आचरण, और अनुयायियों के लिए जनेऊ। चालकद में हज़ारों लोग उन्हें सुनने आते। वे उन्हें ‘धरती आबा’ कहने लगे। उन्होंने कहा कि धरती मुंडाओं की है, दिकुओं की नहीं, यानी बाहरी ज़मींदारों और महाजनों की नहीं।

02उलगुलान

अगस्त 1895 में अंग्रेज़ों ने उन्हें गिरफ़्तार किया और वे दो वर्ष जेल में रहे। दिसंबर 1899 में उलगुलान, यानी महाविद्रोह, भड़का: खूँटी और तमाड़ क्षेत्र में थानों, मिशन केंद्रों और ज़मींदारों के घरों पर तीरों और आग से हमले हुए। 9 जनवरी 1900 को डोंबारी बुरू पहाड़ी पर एकत्र मुंडाओं पर सेना ने हमला किया और बहुत से मारे गए। 3 फ़रवरी 1900 को जमकोपाई के जंगल में बिरसा पकड़े गए और 9 जून को रांची जेल में उनका देहांत हुआ; जेल ने हैज़ा लिखा। 1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम ने आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाई। उनकी जयंती 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य बना, और 2021 से यह दिन जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राँची
स्थान · छोटानागपुर पठार का नगर; जगन्नाथ मंदिर 1691; 2000 से झारखण्ड की राजधानीराँचीछोटानागपुर पठार का प्रमुख नगर, जहाँ 9 जून 1900 को अंग्रेज़ी जेल में बिरसा मुण्डा का देहांत हुआ। पुरानी जेल अब उनका स्मारक है, और 2000 में उनकी जयन्ती पर जन्मे झारखण्ड की राजधानी यहीं है।पढ़ें →