चित्र: Mukunda Goswami · CC BY-SA 3.0
आचार्य

ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद

गौड़ीय वैष्णव आचार्य, इस्कॉन के संस्थापक

1896 ई.—1977 ई.

1 सितम्बर 1896 – 14 नवम्बर 1977

कोलकाता के दवा-व्यापारी अभयचरण दे ने अपने गुरु का आदेश, चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा अंग्रेज़ी में फैलाना, शिरोधार्य किया, उनहत्तर वर्ष की आयु में पुस्तकों का एक बक्सा लेकर अमेरिका गए, और 1966 में न्यूयॉर्क में अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ (इस्कॉन) की स्थापना की। ग्यारह वर्षों में हरे कृष्ण कीर्तन दुनिया भर के नगरों में गूँजने लगा।

011922 का आदेश

1 सितम्बर 1896 को, जन्माष्टमी के अगले दिन, कोलकाता में जन्मे अभय स्कॉटिश चर्च कॉलेज के गांधीवादी छात्र थे, जब 1922 में मित्र उन्हें गौड़ीय मठ के श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती से मिलाने ले गए। पहली ही भेंट में आचार्य ने उनसे कहा कि चैतन्य महाप्रभु का संदेश अंग्रेज़ी बोलने वाले संसार तक ले जाओ। 1933 में प्रयाग में उन्होंने दीक्षा ली। दवा का व्यापार और गृहस्थी चलाते हुए 1944 में उन्होंने ‘बैक टु गॉडहेड’ पत्रिका शुरू की, जिसे वे स्वयं लिखते, छपवाते और बेचते थे। 1959 में मथुरा में संन्यास लेकर वे वृन्दावन के राधा-दामोदर मंदिर में रहकर भागवत पुराण का अनुवाद करने लगे।

02जलदूत और उसके बाद

13 अगस्त 1965 को वे मालवाहक जहाज़ ‘जलदूत’ से कोलकाता से चले, समुद्र में दो बार दिल का दौरा झेला, और 17 सितम्बर को कुछ डॉलर और भागवत के खण्ड लेकर बोस्टन उतरे। न्यूयॉर्क में 26 सेकंड एवेन्यू पर किराये की एक दुकान लेकर 13 जुलाई 1966 को उन्होंने वहीं इस्कॉन का पंजीकरण कराया; उसी अक्टूबर टॉम्पकिन्स स्क्वायर पार्क में एक पेड़ के नीचे कीर्तन किया। भारत के बाहर पहली रथयात्रा 1967 में सैन फ़्रांसिस्को में निकली। अंतिम ग्यारह वर्षों में वे चौदह बार संसार घूमे, छह महाद्वीपों में मंदिर खोले और ‘भगवद्गीता यथारूप’ प्रकाशित की। 14 नवम्बर 1977 को वृन्दावन में उनका देहावसान हुआ; उनकी समाधि वहीं कृष्ण-बलराम मंदिर में है।

नवद्वीप और मायापुर
स्थान · सेन कालीन नगर; चैतन्य महाप्रभु का जन्मस्थान, 1486नवद्वीप और मायापुरभागीरथी तट के जुड़वाँ नगर, जहाँ 1486 में श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ। उससे पहले नवद्वीप सेन राजाओं की अन्तिम राजधानी और नव्य न्याय का केन्द्र था।पढ़ें →