01एक धुरी पर तीन अंग
पूर्व से भीतर आइए तो मन्दिर क्रम से खुलता है। पहले सूर्य कुण्ड, एक आयताकार जलाशय जिसकी सीढ़ियों पर गणेश, विष्णु, शिव और मातृकाओं के सौ से अधिक छोटे देवालय हैं। फिर सभा मण्डप, नक़्क़ाशीदार स्तम्भों का खुला मण्डप जहाँ कभी नृत्य होता था। अन्त में गूढ़ मण्डप और गर्भगृह, ऐसे साधे गए कि विषुव के दिन उगते सूर्य की किरण वहीं पड़े जहाँ सूर्यदेव की प्रतिमा थी। प्रतिमा अब नहीं है। बाहरी दीवारों पर बारह आदित्य, यानी बारह महीनों के सूर्य, ऊँचे जूतों में आज भी खड़े हैं।
02उल्टा लिखा संवत्
गूढ़ मण्डप की दीवार के एक पत्थर पर छोटा-सा लेख है: विक्रम संवत् 1083, यानी 1026–27 ई.। यह उल्टा लगा है, जिससे पता चलता है कि पत्थर निर्माण या मरम्मत के समय दोबारा जड़ा गया। यह वर्ष महत्त्व का है। 1025–26 की सर्दियों में महमूद ग़ज़नवी गुजरात पार करके सोमनाथ पहुँचा था और भीमदेव पीछे हट गए थे। चौलुक्य लौटे और फिर निर्माण किया। मन्दिर पर आज जो टूट-फूट दिखती है, उसे गुजराती वृत्तान्त 1299 में गुजरात रौंदने वाली अलाउद्दीन ख़िलजी की सेनाओं से जोड़ते हैं; फ़ारसी इतिहासों में मोढेरा का नाम अलग से नहीं आता।
03आज का मोढेरा
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण इस स्थल की रक्षा करता है और गर्भगृह में नित्य पूजा नहीं होती। हर जनवरी, मकर संक्रान्ति के बाद, सभा मण्डप की पृष्ठभूमि में मोढेरा नृत्य उत्सव होता है। 2022 में मोढेरा गाँव के घरों की छतों पर सौर पैनल लगे और उसे देश का पहला सौर-ऊर्जा गाँव घोषित किया गया, सूर्य मन्दिर के गाँव के लिए एक उपयुक्त आधुनिक प्रसंग। योजना और नक़्क़ाशी चौलुक्य शिल्पियों की मारु-गुर्जर शैली की है, वही शैली जो आगे देलवाड़ा और रानी की वाव में दिखती है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1026–27 ई.भीमदेव प्रथम के समय निर्माण; दीवार के एक पत्थर पर वि.सं. 1083 अंकित है।
- 1299 ई.अलाउद्दीन ख़िलजी की सेनाएँ गुजरात रौंदती हैं; स्थानीय वृत्तान्त मन्दिर की क्षति इसी अभियान से जोड़ते हैं।
- 2022 ई.मोढेरा देश का पहला सौर-ऊर्जा गाँव घोषित।
अहमदाबाद से लगभग 100 कि.मी. उत्तर-पश्चिम; सूर्योदय से सूर्यास्त तक, भा.पु.स. का टिकट लगता है। सुबह जल्दी आइए, जब धूप सूर्य कुण्ड की सीढ़ियों पर उतरती है।





