01कौठार की देवी
कौठार चम्पा का दक्षिणी प्रान्त था, और उसका महान तीर्थ भगवती का था, जिन्हें चाम यान पो नगर, देश की स्वामिनी कहते थे। यहाँ के संस्कृत अभिलेख बताते हैं कि 774 में समुद्र से आए लुटेरों ने मन्दिर जलाया और लिंग उठा ले गए, और राजा सत्यवर्मन ने उनका पीछा कर समुद्र में उन्हें हराया तथा 784 में देवता की फिर से प्रतिष्ठा की। बाद के राजाओं ने देवी को भूमि, सोना और सेवक दान किए। मुख्य शिखर में आज दस भुजाओं वाली बैठी देवी हैं, जिन्हें बहुत से लोग महिषासुरमर्दिनी मानते हैं।
02एक माता, दो जातियाँ
सत्रहवीं शताब्दी में जब वियतनामियों ने कौठार लिया तो मन्दिर बन्द नहीं किया। उन्होंने देवी को थिएन य आ ना, स्वर्ग की माता के रूप में अपनी पूजा में अपना लिया और चामों के साथ धूप चढ़ाने लगे। पहाड़ी पर मूल शिखरों में से चार आज भी खड़े हैं। हर वर्ष तीसरे चान्द्र मास में यहाँ उत्सव होता है जिसमें चाम नृत्य और वियतनामी अनुष्ठान साथ-साथ होते हैं। संसार में ऐसे स्थान कम हैं जहाँ पहली सहस्राब्दी के हिन्दू मन्दिर में चढ़ावा कभी रुका न हो।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 774 ई.समुद्र से आए लुटेरों ने मन्दिर जलाया और लिंग ले गए।
- 784 ई.राजा सत्यवर्मन ने लुटेरों को हराकर देवता की फिर से प्रतिष्ठा की।
न्हा त्रांग के उत्तरी छोर पर कू लाओ पहाड़ी पर। कन्धे और घुटने ढके रखें; द्वार पर वस्त्र मिलते हैं।




