01जादोनांग का हेराका
उनका जन्म मणिपुर की तामेंगलोंग पहाड़ियों के नुंगकाओ गाँव में रोंगमेई समुदाय में हुआ। तेरह वर्ष की आयु में वे अपने चचेरे भाई हाइपौ जादोनांग के आंदोलन से जुड़ीं, जो ज़ेलियांग्रोंग नागाओं को धर्मांतरण के विरुद्ध, और अंग्रेज़ी कर तथा बेगार के विरुद्ध, अपनी पैतृक आस्था, तिंगकाओ रागवांग की उपासना, की ओर लौटने को पुकारते थे। 29 अगस्त 1931 को अंग्रेज़ों ने जादोनांग को फाँसी दी। सोलह वर्ष की गाइदिन्ल्यू ने उनका स्थान लिया। उन्होंने गाँवों से गृहकर न देने को कहा, और उनके अनुयायी असम राइफ़ल्स से लड़े। उनके सिर पर इनाम रखा गया।
02जेल में पंद्रह वर्ष
17 अक्टूबर 1932 को पुलोमी गाँव में वे पकड़ी गईं और उन्हें आजीवन कारावास मिला। उन्हें गुवाहाटी, शिलांग, आइज़ोल और तुरा की जेलों में रखा गया। 1937 में शिलांग जेल में जवाहरलाल नेहरू उनसे मिले, उन्हें नागाओं की रानी कहा और रिहाई की माँग उठाई, जो स्वतंत्रता के बाद 1947 में ही हुई। वे भारत के भीतर हेराका आस्था और ज़ेलियांग्रोंग लोगों के लिए काम करती रहीं। 1972 में स्वतंत्रता सेनानियों का ताम्रपत्र और 1982 में पद्म भूषण मिला, और 17 फ़रवरी 1993 को लोंगकाओ में उनका देहांत हुआ।

