चित्र: User:Jayantanth · Public domain
स्वतंत्रता सेनानी

विनायक दामोदर सावरकर

क्रांतिकारी, ‘हिंदुत्व’ के लेखक

1883 ई.—1966 ई.

28 मई 1883 – 26 फ़रवरी 1966

अभिनव भारत के संस्थापक, 1857 के इतिहासकार, दस वर्ष सेल्युलर जेल के बंदी, और ‘हिंदुत्व’ (1923) के लेखक। 1937 से 1943 तक वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे।

01अभिनव भारत और इंडिया हाउस

उनका जन्म नासिक के पास भगूर में हुआ। 1899 में बड़े भाई गणेश के साथ उन्होंने ‘मित्र मेला’ बनाया, जो 1904 में गुप्त संस्था ‘अभिनव भारत’ बना। फ़र्ग्युसन कॉलेज के छात्र रहते अक्टूबर 1905 में उन्होंने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलवाई। 1906 में श्यामजी कृष्ण वर्मा की छात्रवृत्ति पर लंदन गए, इंडिया हाउस में रहे और ग्रेज़ इन में क़ानून पढ़ा। वहीं उन्होंने मराठी में मैज़िनी की जीवनी और ‘द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस, 1857’ लिखी, जिसमें विद्रोह को ग़दर नहीं, राष्ट्रीय युद्ध कहा। छपने से पहले ही उस पर प्रतिबंध लगा, और 1909 में हॉलैंड में छपने के बाद वह छिपाकर भारत लाई गई।

02मार्सेई और अंडमान

दिसंबर 1909 में नासिक के कलेक्टर ए. एम. टी. जैक्सन को उस पिस्तौल से गोली मारी गई जिसका सूत्र सावरकर द्वारा भेजी गई खेप से जुड़ा, और 13 मार्च 1910 को लंदन में उन्हें गिरफ़्तार किया गया। 8 जुलाई 1910 को उन्हें भारत ले जा रहा जहाज़ मार्सेई में रुका तो वे शौचालय की खिड़की से निकलकर तैरते हुए तट पर पहुँचे, पर घाट पर फिर पकड़ लिए गए; फ़्रांस यह मामला हेग के स्थायी मध्यस्थता न्यायालय में ले गया, जिसने 1911 में ब्रिटेन के पक्ष में निर्णय दिया। उन्हें दो आजीवन कालापानी, यानी पचास वर्ष, की सज़ा हुई और जुलाई 1911 में वे पोर्ट ब्लेयर की सेल्युलर जेल पहुँचे। 1911 और 1913 में उन्होंने क्षमा याचिकाएँ दीं। 1921 में उन्हें मुख्य भूमि की जेलों में लाया गया और जनवरी 1924 में इस शर्त पर छोड़ा गया कि वे रत्नागिरी ज़िले में रहें और राजनीति से दूर रहें; ये प्रतिबंध 1937 में हटे।

रत्नागिरी
स्थान · कोंकण का बंदरगाह; रत्नदुर्ग; अंग्रेज़ी काल का ज़िला नगररत्नागिरीकोंकण का वह बंदरगाह-नगर जहाँ 1856 में बाल गंगाधर तिलक जन्मे, और जहाँ 1924 से 1937 तक विनायक सावरकर नज़रबन्द रहे और पतितपावन मंदिर हर हिन्दू के लिए खोला। बर्मा का अंतिम राजा यहीं निर्वासन में रहा।पढ़ें →

03हिंदुत्व, रत्नागिरी और उसके बाद

जेल में उन्होंने ‘हिंदुत्व: हिंदू कौन है?’ लिखी, जो 1923 में छपी; इसमें हिंदू उसे कहा गया जो भारत को पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों माने। रत्नागिरी में उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध अभियान चलाया; 1931 में खुले पतित पावन मंदिर में हर जाति का प्रवेश था, और उन्होंने सार्वजनिक सहभोज कराए। 1937 से 1943 तक वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। 1948 में गांधी हत्या मामले में गिरफ़्तार हुए और फ़रवरी 1949 में विशेष न्यायालय ने उन्हें बरी किया। उन्होंने मराठी कविता ‘सागरा प्राण तळमळला’ (1909), जेल संस्मरण ‘माझी जन्मठेप’ और ‘भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ’ लिखे। फ़रवरी 1966 में उन्होंने अन्न और औषधि त्याग दी, जिसे उन्होंने आत्मार्पण कहा, और 26 फ़रवरी 1966 को बंबई में उनका देहांत हुआ।