चित्र: Subhashish Panigrahi · CC BY-SA 3.0
कवि

जयदेव

गीतगोविन्द के कवि

बारहवीं शताब्दी ई.

जयदेव का गीतगोविन्द चौबीस अष्टपदियों में राधा-कृष्ण के प्रेम को गाता है। सदियों से पुरी में भगवान जगन्नाथ के सामने इसका गायन होता है, और यह ओडिसी नृत्य तथा भारतीय भक्ति-संगीत के बड़े भाग का मूल ग्रन्थ है।

01केन्दुली और पद्मावती

जयदेव अपने गाँव का नाम किन्दुबिल्व बताते हैं। ओडिशा की परंपरा इसे पुरी के पास केन्दुली शासन मानती है; बंगाल इसे बीरभूम में अजय नदी के किनारे केन्दुली मानता है, जहाँ हर मकर संक्रान्ति पर बड़ा मेला लगता है, और उन्हें लक्ष्मणसेन की सभा से जोड़ता है। दोनों उनकी पत्नी पद्मावती को याद करते हैं, जो मन्दिर-नर्तकी थीं और उनके गाने पर नाचती थीं। भक्ति परंपरा कहती है कि जब वे वह पंक्ति नहीं लिख पाए जिसमें कृष्ण राधा से अपना चरण उनके सिर पर रखने को कहते हैं, तो वे स्नान करने चले गए, और लौटकर देखा कि वह पंक्ति उन्हीं की लिखावट में लिखी है। कृष्ण ने स्वयं लिखी थी।

02जगन्नाथ के सामने गायन

गीतगोविन्द में बारह सर्ग और आठ-आठ पदों के चौबीस गीत हैं, जिनके राग और ताल निर्धारित हैं। इसका आरम्भ दशावतार स्तोत्र ‘प्रलयपयोधिजले’ से होता है, जिसमें हर अवतार का पद ‘जय जगदीश हरे’ पर समाप्त होता है। जगन्नाथ मन्दिर में 1499 ई. का एक गजपति शिलालेख आदेश देता है कि भगवान के सामने केवल गीतगोविन्द गाया जाए, और रात्रि के भोग में यह प्रथा आज भी चलती है। जयदेव के दो पद गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित हैं। केरल के मन्दिरों में सोपान संगीत के रूप में और पूरे दक्षिण की भजन सम्प्रदाय में अष्टपदियाँ गाई जाती हैं।

सेन वंश
राजवंश · लगभग 1070–1230 ई.सेन वंशदक्षिण के कर्णाट देश से आया एक परिवार पश्चिम बंगाल में बसा, पालों की सेवा की और फिर उनका स्थान ले लिया। इनके दरबार में गीतगोविन्द रचा गया, और लगभग 1204 ई. में बख्तियार खिलजी के धावे में इनकी राजधानी गिरी।पढ़ें →