चित्र: Abinash Chandra Dna · Public domain
संत

श्रीरामकृष्ण परमहंस

दक्षिणेश्वर के पुजारी, विवेकानन्द के गुरु

1836 ई.—1886 ई.

18 फ़रवरी 1836 – 16 अगस्त 1886

कामारपुकुर के ग्रामीण बालक गदाधर चट्टोपाध्याय दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के पुजारी बने और वहाँ तीस वर्ष ईश्वर की ऐसी व्याकुलता में जिए कि कोलकाता उनके कमरे तक खिंचा चला आया। उन्हीं की मण्डली से स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण संघ निकले।

“यत मत, तत पथ। (जितने मत, उतने पथ।)”Sri Sri Ramakrishna Kathamrita (Mahendranath Gupta)

01दक्षिणेश्वर की माँ

रानी रासमणि ने 31 मई 1855 को दक्षिणेश्वर में गंगा तट पर भवतारिणी काली मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, और उन्नीस वर्ष के गदाधर ने जल्द ही वहाँ की पूजा सँभाल ली। वे प्रतिमा के आगे रोते कि माँ ने अब तक दर्शन नहीं दिए। एक दिन, जब वे मंदिर में टँगी तलवार से अपने प्राण लेने को उठे, तभी माँ के दर्शन हुए, प्रकाश का समुद्र। उसके बाद वे वैसे पूजते जैसे बालक माँ से बात करता है, भोग खिलाते, पंखा झलते, कभी-कभी पूजा के नियम ही भूल जाते।

02हर मार्ग पर चलकर

अगले बारह वर्ष उन्होंने एक के बाद एक साधना की। भैरवी ब्राह्मणी ने उन्हें तंत्र की साधनाएँ कराईं। उन्होंने हनुमान की तरह राम को पूजा, और राधा की तरह कृष्ण के लिए तड़पे। परिव्राजक तोतापुरी ने उन्हें संन्यास और अद्वैत की दीक्षा दी, और परम्परा कहती है कि एक ही दिन में वे निर्विकल्प समाधि तक पहुँचे। कुछ समय इस्लाम और ईसा के मार्ग से भी साधना की। इसी से वे आने वालों को बताते कि ईश्वर एक है और रास्ते अनेक।

अंतिम वर्षों में केशवचन्द्र सेन ने उन्हें पढ़े-लिखे बंगालियों से परिचित कराया, और नरेन्द्रनाथ दत्त जैसे युवक उनके पास आकर बैठने लगे। 16 अगस्त 1886 को काशीपुर में गले के कैंसर से उन्होंने देह त्यागी।

दक्षिणेश्वर काली मन्दिर
स्थान · 1847–55, रानी रासमणि; प्राण-प्रतिष्ठा 31 मई 1855दक्षिणेश्वर काली मन्दिरहुगली तट पर काली का नवरत्न मन्दिर, जिसे रानी रासमणि ने बनवाया, जहाँ श्री रामकृष्ण पुजारी रहे और लगभग तीस वर्ष रहे। यहीं नरेन्द्रनाथ दत्त, आगे के स्वामी विवेकानन्द, उनके पास आए।पढ़ें →

“यत मत, तत पथ। (जितने मत, उतने पथ।)”

Sri Sri Ramakrishna Kathamrita (Mahendranath Gupta)