01दक्षिणेश्वर की माँ
रानी रासमणि ने 31 मई 1855 को दक्षिणेश्वर में गंगा तट पर भवतारिणी काली मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, और उन्नीस वर्ष के गदाधर ने जल्द ही वहाँ की पूजा सँभाल ली। वे प्रतिमा के आगे रोते कि माँ ने अब तक दर्शन नहीं दिए। एक दिन, जब वे मंदिर में टँगी तलवार से अपने प्राण लेने को उठे, तभी माँ के दर्शन हुए, प्रकाश का समुद्र। उसके बाद वे वैसे पूजते जैसे बालक माँ से बात करता है, भोग खिलाते, पंखा झलते, कभी-कभी पूजा के नियम ही भूल जाते।
02हर मार्ग पर चलकर
अगले बारह वर्ष उन्होंने एक के बाद एक साधना की। भैरवी ब्राह्मणी ने उन्हें तंत्र की साधनाएँ कराईं। उन्होंने हनुमान की तरह राम को पूजा, और राधा की तरह कृष्ण के लिए तड़पे। परिव्राजक तोतापुरी ने उन्हें संन्यास और अद्वैत की दीक्षा दी, और परम्परा कहती है कि एक ही दिन में वे निर्विकल्प समाधि तक पहुँचे। कुछ समय इस्लाम और ईसा के मार्ग से भी साधना की। इसी से वे आने वालों को बताते कि ईश्वर एक है और रास्ते अनेक।
अंतिम वर्षों में केशवचन्द्र सेन ने उन्हें पढ़े-लिखे बंगालियों से परिचित कराया, और नरेन्द्रनाथ दत्त जैसे युवक उनके पास आकर बैठने लगे। 16 अगस्त 1886 को काशीपुर में गले के कैंसर से उन्होंने देह त्यागी।

“यत मत, तत पथ। (जितने मत, उतने पथ।)”
Sri Sri Ramakrishna Kathamrita (Mahendranath Gupta)
