01विभीषण का प्रसाद
श्रीवैष्णव परंपरा बताती है कि रंगनाथ की मूर्ति अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश के राजा पूजते थे। राज्याभिषेक के बाद श्रीराम ने इसे विभीषण को दिया। लंका ले जाते हुए विभीषण ने संध्या-वंदन के लिए इसे यहाँ रखा, और फिर यह हिली नहीं। रंगनाथ यहीं रहने को माने, पर लंका की ओर, दक्षिण दिशा में मुख करके लेटे हैं। बारह में से एक को छोड़ सभी आळ्वारों ने श्रीरंगम का गान किया; इसे बस ‘कोइल’, यानी मंदिर, कहा जाता है।
021323: लंबा निर्वासन
1323 में उलुग़ ख़ान की सेना, जो बाद में सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ बना, श्रीरंगम पहुँची। मंदिर का इतिवृत्त ‘कोइल ओलुगु’ लिखता है कि मंदिर की रक्षा में हज़ारों श्रीवैष्णव मारे गए, और आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य उत्सव-मूर्ति नम्पेरुमाळ को लेकर दक्षिण भागे और मार्ग में ही देह त्यागी। वेदान्त देशिक ने श्रीभाष्य की टीका की पाण्डुलिपियाँ बचाने के लिए शवों के बीच छिपकर प्राण बचाए। नम्पेरुमाळ लगभग 48 वर्ष केरल, कर्नाटक और तिरुमला में रहे, फिर 1371 में विजयनगर के सेनानायक गोपण उन्हें वापस लाए; पूर्वी दीवार पर गोपण का संस्कृत शिलालेख इस वापसी को दर्ज करता है।
03रामानुज का घर
रामानुजाचार्य ने जीवन का अधिकांश भाग यहीं बिताया, मंदिर की पूजा-व्यवस्था नए सिरे से सँवारी और श्रीभाष्य लिखा। उनका शरीर परिसर के उडैयवर सन्निधि में बैठी मुद्रा में रखा है। मंदिर लगभग 156 एकड़ में है; पूरी-पूरी गलियाँ और घर इसकी दीवारों के भीतर हैं। दक्षिणी राजगोपुर सदियों तक अधूरा रहा, जब तक 1987 में अहोबिल मठ के 44वें जीयर ने इसे लगभग 73 मीटर ऊँचा पूरा नहीं कराया। वैकुण्ठ एकादशी पर, जब उत्तरी ‘परमपद वासल’ खुलता है, लाखों लोग आते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 12वीं शताब्दीरामानुजाचार्य श्रीरंगम में रहे, उपदेश दिया और पूजा-व्यवस्था बनाई।
- 1323उलुग़ ख़ान की सेना ने मंदिर लूटा; नम्पेरुमाळ को सुरक्षित ले जाया गया।
- 1371विजयनगर के गोपण ने नम्पेरुमाळ को फिर प्रतिष्ठित किया।
- 1987दक्षिणी राजगोपुर पूरा हुआ।
आधा दिन रखें। वैकुण्ठ एकादशी (दिसंबर-जनवरी) सबसे बड़ा उत्सव है; पहले से व्यवस्था करें।









