चित्र: Calcutta Art Studio · Public domain
संत

चैतन्य महाप्रभु

नवद्वीप के संत, संकीर्तन के प्रवर्तक

1486 ई.—1534 ई.

1486–1534 ई.

1486 की फाल्गुन पूर्णिमा को बंगाल के नवद्वीप में जन्मे चैतन्य ने हरिनाम कीर्तन को ऐसा आंदोलन बना दिया जिसने बंगाल और ओडिशा की गलियाँ भर दीं। गौड़ीय वैष्णव उन्हें राधा-भाव में स्वयं श्रीकृष्ण मानते हैं।

“तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ (तिनके से भी नम्र, वृक्ष से भी सहनशील, स्वयं मान न चाहकर दूसरों को मान देते हुए, सदा हरि का कीर्तन करना चाहिए।)”Shikshashtakam, verse 3

01पंडित निमाई

उनका जन्म-नाम विश्वम्भर मिश्र था; पिता जगन्नाथ मिश्र, माता शची देवी। नीम के पेड़ के नीचे जन्म होने से उन्हें निमाई कहा गया। बड़े होकर वे नवद्वीप में व्याकरण और न्याय के तीक्ष्ण युवा अध्यापक बने। 1508 में वे पिता का श्राद्ध करने गया गए, वहाँ संन्यासी ईश्वर पुरी से दीक्षा ली और बदले हुए लौटे। अब वही पंडित श्रीवास के आँगन में साथियों के साथ रात-रात भर रोते, नाचते और कृष्ण-नाम गाते।

02पुरी और अंतिम वर्ष

चौबीस वर्ष की आयु में उन्होंने कटवा में केशव भारती से संन्यास लिया और श्रीकृष्ण चैतन्य कहलाए। वे पुरी में बस गए, दक्षिण और वृन्दावन की यात्राएँ कीं, और रूप तथा सनातन गोस्वामी को व्रज भेजा ताकि वे उसके लुप्त तीर्थ खोजें और इस आंदोलन का शास्त्र लिखें। गजपति राजा प्रतापरुद्र उनके भक्त बने। उनकी अपनी रचना केवल आठ श्लोक हैं, शिक्षाष्टकम्। अंतिम अठारह वर्ष वे पुरी में जगन्नाथ के दर्शन में डूबे रहे और 1534 में वहीं देह छोड़ी।

श्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरी
स्थान · 12वीं शताब्दी ई., पूर्वी गंग वंश के अनन्तवर्मन चोडगंग देव (शासन 1078–1147) के समय आरम्भश्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरीपुरुषोत्तम क्षेत्र, चार धामों में पूर्व का धाम, जहाँ भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ दारु (काष्ठ) विग्रहों में विराजते हैं, जिनका नवकलेवर होता है। वर्तमान मन्दिर पूर्वी गंग राजाओं ने बनवाया, और अनेक आक्रमणों में यह इसलिए बचा कि सेवक विग्रहों को उठाकर छिपा देते और फिर लौटा लाते।पढ़ें →

“तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥ (तिनके से भी नम्र, वृक्ष से भी सहनशील, स्वयं मान न चाहकर दूसरों को मान देते हुए, सदा हरि का कीर्तन करना चाहिए।)”

Shikshashtakam, verse 3