चित्र: Madhva of Sangamagrama · Public domain
वैज्ञानिक

संगमग्राम के माधव

केरल गणित-परंपरा के संस्थापक

1340 ई.—1425 ई.

लगभग 1340–1425 ई.

केरल के संगमग्राम के माधव ने ग्रेगरी, न्यूटन और लाइबनिज़ से लगभग 250 वर्ष पहले π, ज्या, कोटिज्या और व्युत्क्रम-स्पर्शज्या की अनन्त श्रेणियाँ खोजीं। उन्होंने π का मान दशमलव के ग्यारह अंकों तक शुद्ध निकाला।

01अनन्त योग के रूप में π

माधव संगमग्राम में रहते थे, जिसे त्रिशूर के पास इरिंजालकुडा माना जाता है। उनके अपने कुछ ही ग्रन्थ बचे हैं, जैसे वेण्वारोह और स्फुटचन्द्राप्ति, पर उनके शिष्यों के शिष्यों ने उनके परिणाम उनके नाम के साथ सुरक्षित रखे। नीलकण्ठ सोमयाजी का तन्त्रसंग्रह (लगभग 1500) और ज्येष्ठदेव की युक्तिभाषा (लगभग 1530, मलयालम में, पूरे प्रमाणों सहित) उन्हें उद्धृत करते हैं। व्यास को चार से गुणा करो, फिर उसमें से बारी-बारी चार-गुणे व्यास को 3, 5, 7 आदि से भाग देकर घटाओ और जोड़ो: परिधि मिल जाती है। आज के संकेतों में π/4 = 1 − 1/3 + 1/5 − 1/7 + … । यूरोप इसे लाइबनिज़ श्रेणी कहता है; लाइबनिज़ इस तक 1673–74 में पहुँचे।

02संशोधन-पद और ज्या-श्रेणी

यह श्रेणी π की ओर बहुत धीरे बढ़ती है, और माधव यह जानते थे। उन्होंने योग रोकने के बाद एक संशोधन-पद जोड़ा, जिससे कुछ दर्जन पदों से ही अनेक शुद्ध अंक मिल जाते हैं, और श्रेणी को तेज़ रूपों में बदला। उनका π का मान, 3.14159265359, दशमलव के ग्यारह अंकों तक शुद्ध है। उन्होंने ज्या और कोटिज्या की वे श्रेणियाँ भी दीं जिनका श्रेय यूरोप न्यूटन (1660 का दशक) को देता है, और लगभग सात-आठ दशमलव तक शुद्ध ज्या-सारणी, जो कटपयादि अक्षर-कूट में सुरक्षित है। यह परंपरा माधव से परमेश्वर, दामोदर, नीलकण्ठ और ज्येष्ठदेव तक चली, केरल के कुछ गाँवों में लगभग दो शताब्दियों की गुरु-शिष्य शृंखला।

केरल का गणित और ज्योतिष सम्प्रदाय
प्रमाण · लगभग 1350–1650 ई.केरल का गणित और ज्योतिष सम्प्रदायगुरु-शिष्यों की एक परम्परा, जो संगमग्राम के माधव से आरम्भ हुई, जिसने पाई और ज्या-कोज्या की अनन्त श्रेणियाँ यूरोप से लगभग तीन शताब्दी पहले खोज लीं।पढ़ें →