01सूर्य का रथ
पूरा मन्दिर सूर्य देव का रथ है। चबूतरे पर बारह जोड़ी पहिये हैं, हर एक लगभग तीन मीटर व्यास का; उनकी तीलियाँ धूपघड़ी का काम करती हैं और परिधि के मनके दिन के भाग गिनते हैं। आगे सात घोड़े जुते हैं। साम्ब पुराण बताता है कि श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब चन्द्रभागा तट पर मित्रवन में सूर्य उपासना से कुष्ठ से मुक्त हुए। कोणार्क यह स्मृति आज भी रखता है: माघ शुक्ल सप्तमी को तीर्थयात्री भोर से पहले चन्द्रभागा तट पर स्नान कर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
02नरसिंहदेव प्रथम की रचना
नरसिंहदेव प्रथम (शासन 1238–1264) वे गंग राजा थे जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के सूबेदारों के विरुद्ध युद्ध बंगाल तक पहुँचाया, और उन्हीं के राज्य में लगभग 1250 में कोणार्क बना। मुख्य देउल कभी बचे हुए जगमोहन से कहीं ऊँचा था; नाविक उसे दिशासूचक मानते और ‘ब्लैक पगोडा’ कहते थे। दीवारों पर पूरे राज्य का जीवन है: वादक, नर्तक, आखेट, हाथी, एक जिराफ़, और पूजा करते स्वयं राजा। शिखर के आधार के आलों में हरे क्लोराइट पत्थर की सूर्य की तीन प्रतिमाएँ, प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या की, आज भी खड़ी हैं।
03पतन और रेत का भराव
मुख्य शिखर कब और कैसे गिरा, यह निश्चित रूप से दर्ज नहीं; 19वीं शताब्दी के आरम्भ तक यात्रियों ने उसे पत्थरों का ढेर पाया। 1903 में जब जगमोहन में दरारें पड़ने लगीं, तब बंगाल सरकार ने उसके द्वार चिनवा दिए और छत गिरने से बचाने के लिए भीतर रेत भरवा दी। तब से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस स्थल की देखरेख करता है, और यूनेस्को ने 1984 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया। हर दिसम्बर इसकी दीवारों के सामने कोणार्क नृत्य उत्सव होता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 1250नरसिंहदेव प्रथम कोणार्क में सूर्य मन्दिर बनवाते हैं।
- 1903गिरने से बचाने के लिए जगमोहन को बन्द कर रेत से भरा जाता है।
- 1984यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित।
सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला; पहियों पर पड़ती धूप देखने सुबह जल्दी जाएँ। चन्द्रभागा तट 3 किमी दूर है।




