01मिशनरियों को उत्तर
उनका जन्म तिरुत्तणि में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ और उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई की, जहाँ शिक्षकों द्वारा वेदांत की आलोचना ने उन्हें उसका उत्तर देने को प्रेरित किया। 1908 का उनका एमए शोध वेदांत के नीतिशास्त्र पर था। उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज, फिर मैसूर में पढ़ाया, और 1921 से कलकत्ता में किंग जॉर्ज पंचम दर्शनशास्त्र पीठ सँभाली। उनकी ‘इंडियन फ़िलॉसफ़ी’ (दो खंड, 1923 और 1927) ने संसार के सामने दर्शनों को रखा। 1926 में ऑक्सफ़र्ड में दिए उनके अप्टन व्याख्यान ‘द हिंदू व्यू ऑफ़ लाइफ़’ ने हिंदू धर्म को अनुभव की जीवित परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया। 1936 से 1952 तक वे ऑक्सफ़र्ड में पूर्वी धर्म और नीतिशास्त्र के स्पॉल्डिंग प्रोफ़ेसर रहे।
02बीएचयू, राष्ट्रपति भवन और शिक्षक दिवस
1939 से 1948 तक वे मालवीयजी के बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और युद्ध के वर्षों में उसे चलाए रखा। 1948–49 के विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की अध्यक्षता की और 1949 से 1952 तक सोवियत संघ में राजदूत रहे। उन्होंने भगवद्गीता (1948), प्रमुख उपनिषदों (1953) और ब्रह्मसूत्र (1960) का अनुवाद और भाष्य किया। 1952 से 1962 तक वे उपराष्ट्रपति और 1962 से 1967 तक राष्ट्रपति रहे। 1962 में छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की अनुमति माँगी तो उन्होंने उसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाने को कहा, और तब से 5 सितंबर शिक्षक दिवस है। 1954 में उन्हें भारत रत्न मिला और 17 अप्रैल 1975 को मद्रास में उनका देहांत हुआ।


