01आर्य समाज, डीएवी और बैंक
उनका जन्म फ़िरोज़पुर ज़िले (अब मोगा) के ढुडिके में हुआ और उन्होंने हिसार, फिर लाहौर में वकालत की। स्वामी दयानंद के आर्य समाज ने उनके सार्वजनिक जीवन को दिशा दी। उन्होंने लाला हंसराज के साथ लाहौर में दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज खड़ा किया, जो 1886 में खुला, और 1894 में भारतीयों के स्वामित्व वाले पंजाब नेशनल बैंक के संस्थापकों में रहे। 1890 के दशक में उन्होंने अकाल राहत का प्रबंध किया और अनाथ बच्चों को मिशनों के हाथ जाने से बचाया। मई 1907 में नहर बस्ती आंदोलन के दौरान उन्हें बिना मुक़दमे मांडले निर्वासित किया गया और उसी नवंबर छोड़ा गया।
02अमेरिका, कांग्रेस और लाहौर की लाठी
प्रथम विश्वयुद्ध के वर्ष उन्होंने अमेरिका में बिताए, जहाँ ‘यंग इंडिया’ (1916) लिखी और 1917 में इंडियन होम रूल लीग ऑफ़ अमेरिका बनाई। भारत लौटकर सितंबर 1920 में कलकत्ता के विशेष कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की और 1921 में सर्वेंट्स ऑफ़ द पीपल सोसाइटी स्थापित की। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में उन्होंने केवल अंग्रेज़ सदस्यों वाले साइमन कमीशन के विरुद्ध मौन जुलूस का नेतृत्व किया। पुलिस ने लाठी चलाई और अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर उनकी छाती पर लाठियाँ पड़ीं। 17 नवंबर 1928 को उनका देहांत हुआ। एक महीने बाद भगत सिंह और राजगुरु ने इसके उत्तर में लाहौर में पुलिस अधिकारी जे. पी. सॉन्डर्स को गोली मारी।

