चित्र: Ghasi (court of Mewar, fl. 1820–36) · Public domain
शासक

महाराणा प्रताप

अकबर के आगे कभी न झुकने वाले मेवाड़ के महाराणा

1540 ई.—1597 ई.

1540–1597 ई.; शासन 1572–1597

प्रताप सिंह ने मुग़ल दरबार के हर दूत को लौटाया, 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मानसिंह की सेना से लड़े, और अगले बीस वर्ष पहाड़ों से मेवाड़ वापस जीतने में लगाए; 1597 में चावंड में उनके निधन तक केवल चित्तौड़ और मांडलगढ़ मुग़लों के पास बचे थे।

01इनकार

प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में उदयसिंह द्वितीय के घर हुआ। 1568 में चित्तौड़ अकबर के हाथ जा चुका था, और 1572 में जब गोगुंदा में प्रताप महाराणा बने, तब तक अधिकांश राजपूत घराने मुग़ल सेवा में थे। 1572 और 1573 के बीच अकबर ने चार दूत भेजे, अंतिम राजा टोडरमल के नेतृत्व में। प्रताप ने उनका आदर किया पर दरबार जाने से मना किया। उनके मेवाड़ में न उपजाऊ मैदान था, न बड़ा नगर; था तो अरावली, हर घाटी जानने वाले भील धनुर्धर, और न झुकने वाले कुल।

02हल्दीघाटी, 18 जून 1576

अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह को बड़ी सेना के साथ भेजा। गोगुंदा के पास पीली मिट्टी वाली संकरी घाटी हल्दीघाटी में आमना-सामना हुआ। प्रताप के हरावल का नेतृत्व हकीम खाँ सूर ने किया और राणा पूंजा के भील धनुर्धरों ने पहाड़ियाँ थामीं। प्रताप ने अपने घोड़े चेतक पर मानसिंह के हाथी पर धावा बोला। मुग़ल पक्ष से लड़े अब्दुल क़ादिर बदायूँनी ने उस दिन का आँखों देखा वर्णन छोड़ा है। जब युद्ध पलटा तो झाला मान ने राजछत्र अपने सिर पर ले लिया ताकि प्रताप निकल सकें; घायल चेतक स्वामी को बाहर लाकर कुछ ही देर में चल बसा। मुग़लों ने रणक्षेत्र तो रखा, पर राणा को पकड़ न सके।

मेवाड़ के गुहिल और सिसोदिया
राजवंश · लगभग छठी शताब्दी–1949 ई.मेवाड़ के गुहिल और सिसोदियाबप्पा रावल से महाराणा प्रताप तक मेवाड़ के घराने ने दिल्ली से आई हर शक्ति के सामने अपनी पहाड़ियाँ थामे रखीं। यह संसार के सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले राजवंशों में है।पढ़ें →

03मेवाड़ की वापसी

वर्षों तक राणा एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ जाते रहे और मुग़ल सेनाएँ नगरों में बैठी रहीं। मंत्री भामाशाह ने अपने परिवार का धन उनके चरणों में रख दिया और सेना फिर खड़ी हुई। 1582 में दिवेर में प्रताप और उनके पुत्र अमर सिंह ने मुग़ल थाना और उसका सेनापति ध्वस्त किया, और इसके बाद मेवाड़ भर की मुग़ल चौकियाँ एक-एक कर गिरीं। उन्होंने चावंड को राजधानी बनाया और वहाँ चामुंडा का मंदिर बनवाया। 19 जनवरी 1597 को चावंड में जब उनका देहांत हुआ, तब उदयपुर, कुंभलगढ़ और अधिकांश मेवाड़ फिर उनका था।