लगभग आठ महीने बाद दुर्ग ले लिया गया; अलाउद्दीन ने कत्लेआम का आदेश दिया और अपने बेटे के नाम पर चित्तौड़ का नाम ख़िज़्राबाद रख दिया।
01पहाड़ी पर आठ महीने
चित्तौड़ गम्भीरी नदी के ऊपर एक लम्बे पठार पर बसा है। अलाउद्दीन ने गम्भीरी और बेड़च के बीच डेरा डाला और गर्मियों भर घेरा रखा। ख़ुसरो दुर्ग के पतन का दिन सोमवार, 11 मुहर्रम 703 हिजरी बताता है, जो 26 अगस्त 1303 बनता है। फ़ारसी वृत्तांत से रत्नसिंह का अन्त स्पष्ट नहीं होता। सुल्तान ने दुर्ग अपने बेटे ख़िज़्र ख़ाँ को देकर उसका नाम ख़िज़्राबाद रखा। कुछ ही वर्षों में दिल्ली ने उसे एक राजपूत सामन्त को सौंप दिया और राणा हम्मीर के नेतृत्व में सिसोदियों ने उसे वापस जीत लिया।
02रानी पद्मिनी
1303 के साथ सबसे अधिक जिस नाम को जोड़ा जाता है, वह है रत्नसिंह की रानी पद्मिनी, जिन्होंने दुर्ग की स्त्रियों के साथ जौहर की अग्नि में प्रवेश किया। उनकी कथा हम तक मलिक मुहम्मद जायसी के अवधी काव्य ‘पद्मावत’ (1540) और राजपूत चारणों की अनेक परम्पराओं से पहुँची है। उस समय के फ़ारसी लेखक उनका नाम नहीं लेते। मेवाड़ ने उन्हें चित्तौड़ के पहले महान जौहर के रूप में सहेजा है, और दुर्ग पर आज भी उन्हें इसी रूप में याद किया जाता है।

चित्तौड़ के तीन सकों में पहला; दुर्ग एक पीढ़ी के भीतर खोया और फिर लौटा, और सिसोदियों के नेतृत्व में मेवाड़ फिर उठ खड़ा हुआ।

