कश्मीर हथियाने की पाकिस्तान की योजना विफल रही; 23 सितंबर के संयुक्त राष्ट्र युद्धविराम के बाद ताशकंद घोषणा से दोनों पक्ष युद्ध-पूर्व सीमाओं पर लौट गए।
01जिब्राल्टर से लाहौर तक
अगस्त 1965 में पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत हज़ारों हथियारबंद घुसपैठिए कश्मीर में भेजे, इस आशा में कि स्थानीय विद्रोह होगा, जो कभी नहीं हुआ। भारतीय सैनिकों ने युद्धविराम रेखा पार कर 28 अगस्त को हाजी पीर दर्रा ले लिया। 1 सितंबर को पाकिस्तान ने छंब क्षेत्र में टैंकों के साथ ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम छेड़ा, जिसका निशाना अखनूर और जम्मू की सड़क था। 6 सितंबर को भारत ने लाहौर और सियालकोट की ओर अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की, और पाकिस्तान के टैंक उधर खिंच गए।
02असल उत्तर और ताशकंद
8 से 10 सितंबर के बीच पाकिस्तान की पहली आर्मर्ड डिवीज़न खेमकरण के पास भारतीय पंजाब में घुसी। चौथी माउंटेन डिवीज़न ने उसे असल उत्तर के आसपास पानी भरे गन्ने के खेतों में आने दिया और नष्ट कर दिया; दर्जनों पैटन टैंक तोड़े गए या छोड़ दिए गए। 4 ग्रेनेडियर्स के कंपनी क्वार्टरमास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने जीप पर लगी रिकॉयललेस तोप से कई टैंक नष्ट किए, फिर वीरगति पाई, और उन्हें परमवीर चक्र मिला। सियालकोट क्षेत्र में फिल्लौरा और चविंडा के बड़े टैंक युद्ध हुए। 23 सितंबर को युद्धविराम हुआ। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में शास्त्री और अय्यूब ने घोषणा पर हस्ताक्षर किए; उसी रात वहीं शास्त्री जी का देहांत हो गया।
इस युद्ध ने बल से कश्मीर लेने की पाकिस्तान की आशा समाप्त कर दी, और शास्त्री जी का ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा इसी से निकला।
