मान्यखेट के राष्ट्रकूट

राष्ट्रकूट चालुक्यों के सामन्त से उठकर भारत के सबसे शक्तिशाली सिंहासन तक पहुँचे, और उनके अभियान कन्नौज से रामेश्वरम तक गए। एलोरा का कैलास मन्दिर, जो एक ही पहाड़ी को ऊपर से नीचे काटकर बना, उन्हीं की देन है।

  1. दन्तिदुर्गc. 735–756
  2. कृष्ण प्रथमc. 756–774
  3. गोविन्द द्वितीयc. 774–780
  4. ध्रुव धारावर्षc. 780–793
  5. गोविन्द तृतीयc. 793–814
  6. अमोघवर्ष प्रथमc. 814–878
  7. कृष्ण द्वितीयc. 878–914
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काल: लगभग 753–982 ई.क्षेत्र: दक्कन; शिखर पर गंगा-यमुना दोआब से रामेश्वरम तकराजधानियाँ: मान्यखेट (मलखेड)
चित्र: Shishirdasika · CC BY-SA 4.0

01पहाड़ी जो मन्दिर बनी

दन्तिदुर्ग ने एलोरा की दशावतार गुफा में अपने उत्थान का लेख खुदवाया, और लगभग 753 ई. में बादामी के अन्तिम चालुक्य को हटा दिया। उनके चाचा कृष्ण प्रथम ने फिर अपने शिल्पियों से कैलास तराशवाया: बेसाल्ट की चट्टान के शिखर से आरम्भ करके वे नीचे की ओर काटते गए, और अनुमानतः दो लाख टन पत्थर हटाकर भगवान शिव का पूरा मन्दिर खड़ा कर दिया, जिसमें नन्दी मण्डप, द्वार और हाथी एक गहरे प्रांगण में स्वतन्त्र खड़े हैं। 812 ई. के बड़ौदा ताम्रपत्र में ही एलापुर के एक ऐसे अद्भुत मन्दिर का उल्लेख है जिसे देखकर उसके निर्माता को भी आश्चर्य हुआ कि यह उसने बनाया।

02कन्नौज और त्रिपक्षीय संघर्ष

कन्नौज उस युग का सबसे बड़ा पुरस्कार था, और तीन घराने उसके लिए लड़े: पश्चिम के प्रतिहार, बंगाल के पाल और राष्ट्रकूट। ध्रुव उत्तर आए और वत्सराज तथा धर्मपाल दोनों को हराया। उनके पुत्र गोविन्द तृतीय ने नागभट द्वितीय को पराजित किया और हिमालय तक गए। इन्द्र तृतीय ने लगभग 916 ई. में स्वयं कन्नौज को लूटा। दक्षिण में कृष्ण तृतीय ने 949 ई. में तक्कोलम में चोल सेना को तोड़ा, जहाँ चोल राजकुमार राजादित्य अपने हाथी पर मारे गए। 851 ई. में लिखने वाले अरब व्यापारी सुलैमान ने बल्हरा, अर्थात राष्ट्रकूट राजा, को संसार के चार महान राजाओं में गिना।

धर्मपाल
व्यक्तित्व · शासन लगभग 775–810 ई.धर्मपालगोपाल के पुत्र धर्मपाल पाल-शक्ति को बंगाल से गंगा के ऊपर कान्यकुब्ज तक ले गए और वहाँ उत्तर भारत के राजाओं की सभा के सामने अपनी पसन्द के राजा का अभिषेक कराया। विक्रमशिला महाविहार उन्हीं की स्थापना है, और बौद्ध विहारों के बड़े संरक्षक के रूप में उनका नाम चलता है।पढ़ें →

03अमोघवर्ष और मान्यखेट

अमोघवर्ष प्रथम 814 ई. में बालक के रूप में सिंहासन पर बैठे और साठ वर्ष से अधिक राज किया। उन्होंने मान्यखेट को, जो आज कलबुर्गी जिले का मलखेड है, अपनी राजधानी बनाया। कन्नड़ काव्यशास्त्र का सबसे पुराना उपलब्ध ग्रन्थ कविराजमार्ग उनके दरबार में लिखा गया, और जैन आचार्य जिनसेन उनके गुरु थे। अन्त शीघ्र आया। 972 ई. में परमार सीयक ने मान्यखेट को लूटा, और 973 ई. में चालुक्य तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय को हटा दिया। अन्तिम दावेदार इन्द्र चतुर्थ ने 982 ई. में श्रवणबेलगोला में अन्न त्यागकर देह छोड़ी।

शासक

  1. 1दन्तिदुर्गबादामी के चालुक्यों को हटायाc. 735–756
  2. 2कृष्ण प्रथमएलोरा का कैलास मन्दिरc. 756–774
  3. 3गोविन्द द्वितीयc. 774–780
  4. 4ध्रुव धारावर्षवत्सराज और धर्मपाल को हरायाc. 780–793
  5. 5गोविन्द तृतीयनागभट द्वितीय को हराया; हिमालय तक पहुँचेc. 793–814
  6. 6अमोघवर्ष प्रथममान्यखेट बसाया; उनके दरबार में कविराजमार्गc. 814–878
  7. 7कृष्ण द्वितीयc. 878–914
  8. 8इन्द्र तृतीयकन्नौज को लूटाc. 914–929
  9. 9गोविन्द चतुर्थc. 930–936
  10. 10अमोघवर्ष तृतीयc. 936–939
  11. 11कृष्ण तृतीय949 ई. में तक्कोलम में चोलों पर विजयc. 939–967
  12. 12खोट्टिगपरमारों ने मान्यखेट लूटाc. 967–972
  13. 13कर्क द्वितीयतैलप द्वितीय ने अपदस्थ कियाc. 972–973

उनकी विरासत

  • एलोरा का कैलास मन्दिर (गुफा 16)
  • एलोरा की जैन गुफाएँ, जिनमें इन्द्र सभा है
  • कविराजमार्ग, कन्नड़ काव्यशास्त्र का सबसे पुराना उपलब्ध ग्रन्थ
  • पट्टदकल का जैन नारायण मन्दिर