01गोदी और भण्डार
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के एस. आर. राव ने 1954 में टीला खोजा और 1955 से 1960 तक खुदाई की। पूर्वी ओर पकी ईंटों का लगभग 220 मीटर लम्बा आयताकार बेसिन है, जिसमें प्रवेश-नाली और अतिरिक्त जल निकासी है; राव ने इसे ज्वार-गोदी माना, जो साबरमती की पुरानी धारा से समुद्र से जुड़ी थी। कुछ विद्वानों ने इसे जलाशय बताया है; समुद्री अवशेषों और पास के भण्डारगृह के आधार पर राव की व्याख्या ही प्रचलित है। भण्डारगृह ऊँचे ईंट-चबूतरे पर था, और उसकी राख में मिट्टी की मुहर-छापें मिलीं, जिन पर उन गाँठों के निशान हैं जिन्हें वे बन्द करती थीं।
02मनके, वेदियाँ और खाड़ी की मुहर
लोथल में मनकों का कारख़ाना था जहाँ महीन बरमों से कार्नेलियन और अकीक छेदे जाते थे, ताम्रकार की कार्यशाला थी, और स्नान-चबूतरों तथा नालियों वाले घरों का निचला नगर था। राव को घरों में अग्निवेदियाँ और ऊपरी नगर पर उनकी पंक्ति मिली, और फ़ारस की खाड़ी प्रकार की गोल बटन-मुहर, जो अरब सागर के पार व्यापार का प्रमाण है। स्थल संग्रहालय में अवशेष रखे हैं। स्थल के पास राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर बन रहा है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 2400 ई.पू.हड़प्पाई नगर और गोदी बनी।
- 1954 ई.एस. आर. राव स्थल खोजते हैं।
- 1955–60एस. आर. राव के नेतृत्व में भा.पु.स. की खुदाई।
सरगवाला गाँव, अहमदाबाद ज़िला, अहमदाबाद से लगभग 80 किमी दक्षिण-पश्चिम; संग्रहालय शुक्रवार को बन्द।





