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संत

मुत्तुस्वामी दीक्षितर

संस्कृत कृतियों के रचयिता, कर्नाटक संगीत त्रिमूर्ति में

1775 ई.—1835 ई.

1775–1835 ई.

मुत्तुस्वामी दीक्षितर ने संस्कृत में, एक-एक मंदिर के लिए, कृतियाँ रचीं, और हर कृति में ‘गुरुगुह’ मुद्रा रखी। उनकी कमलाम्बा नवावरण और नवग्रह कृतियाँ मंदिरों और सभाओं में गाई जाती हैं, और 1835 की दीपावली को एट्टयपुरम में उनका देहांत हुआ।

01काशी और तिरुत्तणि

संगीतकार रामस्वामी दीक्षितर के पुत्र, तिरुवारूर में जन्मे, वे युवावस्था में योगी चिदम्बरनाथ के साथ काशी गए और पाँच वर्ष वहाँ रहे, श्रीविद्या उपासना सीखी और उत्तर का संगीत सुना। परिवार की परम्परा कहती है कि वहाँ से लौटते समय गंगा से एक वीणा उठकर उनके हाथों में आई। तिरुत्तणि में भगवान मुरुगन ने वृद्ध के रूप में उनके मुँह में मिसरी डाली, और उन्होंने मायामालवगौळ में पहली कृति ‘श्रीनाथादि गुरुगुहो जयति’ गाई। मुरुगन का नाम गुरुगुह उनकी मुद्रा बन गया।

02नवावरण और अंतिम दीपावली

उनकी कृतियाँ दक्षिण के मंदिरों का नक्शा हैं: तिरुवारूर की देवी के लिए कमलाम्बा नवावरण, श्रीचक्र के नौ आवरणों के क्रम में; नवग्रह कृतियाँ, हर ग्रह के लिए एक; पंचभूत लिंग कृतियाँ, पाँच तत्त्वों वाले शिव मंदिरों के लिए। उन्होंने फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज के बैंड से सुनी लगभग चालीस अंग्रेज़ी धुनों पर संस्कृत शब्द भी बैठाए, जो नोट्टुस्वर कहलाते हैं। 1835 की दीपावली को एट्टयपुरम में उन्होंने शिष्यों से ‘मीनाक्षि मे मुदं देहि’ गाने को कहा, और उनके गाते-गाते देह त्याग दी।

तिरुत्तणि
स्थान · मुरुगन का पहाड़ी मंदिर, छह पडै वीडु में से एकतिरुत्तणिवह पहाड़ी जहाँ सूरपद्मन से युद्ध के बाद मुरुगन का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने विश्राम किया, और जहाँ उन्होंने वल्ली से विवाह किया। छह पडै वीडु में से एक, यहीं मुत्तुस्वामी दीक्षितर ने अपनी पहली कृति गाई; 1888 में इसी नगर में स. राधाकृष्णन का जन्म हुआ।पढ़ें →