01कालैयार कोविल, 1772
वे रामनाथपुरम के सेतुपति राजा की इकलौती संतान थीं, और उन्हें घुड़सवारी, धनुर्विद्या, फेंककर मारने वाला शस्त्र ‘वळरी’ और सिलंबम के साथ कई भाषाएँ सिखाई गईं। उनका विवाह शिवगंगा के राजा मुत्तु वडुगनाथ तेवर से हुआ। 1772 में अर्काट के नवाब ने जोसेफ़ स्मिथ और बेंजामिन बॉनजूर के अधीन कंपनी सैनिकों के साथ कर वसूलने शिवगंगा पर चढ़ाई की। उनके पति कालैयार कोविल में लड़ते हुए मारे गए। वेलु नाच्चियार अपनी छोटी बेटी के साथ निकल गईं और डिंडीगुल के पास विरुपाच्चि में गोपाल नायकर की शरण ली।
02वापसी, 1780
आठ वर्ष उन्होंने सेना खड़ी की। कंपनी और नवाब से युद्ध में लगे मैसूर के हैदर अली ने उन्हें घुड़सवार और तोपें दीं। 1780 में मरुदु भाइयों की कमान में उनकी सेना लड़ती हुई लौटी और शिवगंगा जीत लिया। तमिल परंपरा उनकी सेनानायिका कुयिली की कथा सुनाती है, जो स्त्री-दल की अगुवा थीं और कहा जाता है कि अपने शरीर में आग लगाकर शत्रु के बारूदख़ाने में कूद गईं। 1780 के दशक में वेलु नाच्चियार ने मरुदु भाइयों को मंत्री बनाकर शिवगंगा पर राज किया और फिर राज्य अपनी पुत्री वेल्लच्चि को सौंपा। 25 दिसंबर 1796 को उनका देहांत हुआ।






