मावलों ने रात के धावे में दुर्ग जीत लिया; उदयभान से द्वंद्व में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए।
01रात की चढ़ाई
माघ की एक अँधेरी रात तानाजी के मावले पश्चिम की उस खड़ी ढलान से ऊपर आए जहाँ पहरा सबसे ढीला था। रस्सियाँ बाँधी गईं, कुछ जवान दीवार पार कर गए और शोर फैलने से पहले बाक़ी भी पहुँच गए। औरंगज़ेब की ओर से दुर्ग सँभाल रहे राजपूत किलेदार उदयभान राठौड़ ने तलवार से तानाजी का सामना किया। दोनों खेत रहे। मावले डगमगाए, तब तानाजी के भाई सूर्याजी ने उन्हें फिर जुटाया और पीछे की रस्सियाँ काट दीं, ताकि लौटने का रास्ता ही न बचे। भोर तक दुर्ग शिवाजी महाराज का था।
02गड आला, पण सिंह गेला
महाराष्ट्र शिवाजी महाराज का शोक एक पंक्ति में याद रखता है: गढ़ तो आया, पर सिंह चला गया। इसी कहावत से दुर्ग का बाद का नाम पड़ा, सिंहगढ़। पहाड़ी पर तानाजी की समाधि है, और शाहीर तुलसीदास का इस धावे का पोवाड़ा आज भी गाया जाता है। इस विजय के बाद के वर्ष में मराठों ने पुरंदर संधि में गए दुर्ग एक-एक कर वापस लिए।

इससे पुरंदर में सौंपे दुर्गों की वापसी शुरू हुई, और महाराष्ट्र को उसकी सबसे प्रिय वीरगाथा मिली।


