सिंहगढ़ (कोंढाणा) की विजय

विजेतास्वराज्य (मराठा)तानाजी मालुसरे, फिर उनके भाई सूर्याजी
1670 ई.बनाम
पक्षमुग़ल दुर्गरक्षक सेनाउदयभान राठौड़, किलेदार

1665 की पुरंदर संधि में कोंढाणा मुग़लों को चला गया था। पाँच वर्ष बाद तानाजी मालुसरे चुने हुए साथियों के साथ रात में खड़ी चट्टान चढ़कर उसे लौटा लाए।

तिथि: 4 फ़रवरी 1670 ई.स्थान: कोंढाणा दुर्ग, पुणे के दक्षिण-पश्चिम, महाराष्ट्रप्रकार: घेराबंदी
चित्र: DesiBoy101 · CC BY-SA 4.0
परिणाम

मावलों ने रात के धावे में दुर्ग जीत लिया; उदयभान से द्वंद्व में तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए।

01रात की चढ़ाई

माघ की एक अँधेरी रात तानाजी के मावले पश्चिम की उस खड़ी ढलान से ऊपर आए जहाँ पहरा सबसे ढीला था। रस्सियाँ बाँधी गईं, कुछ जवान दीवार पार कर गए और शोर फैलने से पहले बाक़ी भी पहुँच गए। औरंगज़ेब की ओर से दुर्ग सँभाल रहे राजपूत किलेदार उदयभान राठौड़ ने तलवार से तानाजी का सामना किया। दोनों खेत रहे। मावले डगमगाए, तब तानाजी के भाई सूर्याजी ने उन्हें फिर जुटाया और पीछे की रस्सियाँ काट दीं, ताकि लौटने का रास्ता ही न बचे। भोर तक दुर्ग शिवाजी महाराज का था।

02गड आला, पण सिंह गेला

महाराष्ट्र शिवाजी महाराज का शोक एक पंक्ति में याद रखता है: गढ़ तो आया, पर सिंह चला गया। इसी कहावत से दुर्ग का बाद का नाम पड़ा, सिंहगढ़। पहाड़ी पर तानाजी की समाधि है, और शाहीर तुलसीदास का इस धावे का पोवाड़ा आज भी गाया जाता है। इस विजय के बाद के वर्ष में मराठों ने पुरंदर संधि में गए दुर्ग एक-एक कर वापस लिए।

तानाजी मालुसरे
व्यक्तित्व · मृत्यु 4 फ़रवरी 1670तानाजी मालुसरेमावळ के सूबेदार और शिवाजी के सबसे पुराने साथियों में से एक तानाजी मालुसरे ने 4 फ़रवरी 1670 की रात वह धावा बोला जिसने कोंढाणा को मुग़ल किलेदार से छीन लिया। इसी लड़ाई में वे वीरगति को प्राप्त हुए, और यह दुर्ग आज भी सिंहगढ़ कहलाता है।पढ़ें →
महत्त्व

इससे पुरंदर में सौंपे दुर्गों की वापसी शुरू हुई, और महाराष्ट्र को उसकी सबसे प्रिय वीरगाथा मिली।