01हिसाब-दफ़्तर से पहाड़ों तक
उनका जन्म कोलाबा (आज रायगढ़) ज़िले के शिरढोण गाँव में हुआ और वे पुणे में सैनिक वित्त कार्यालय में लिपिक थे। महाराष्ट्र में कहा जाता है कि मरणासन्न माँ से मिलने के लिए उन्हें समय पर छुट्टी नहीं मिली, और यह बात उन्होंने कभी नहीं भुलाई। 1876–77 के दक्खन अकाल ने निर्णय करा दिया। उन्होंने नौकरी छोड़ी और रामोशी, कोली और धनगर साथियों को इकट्ठा किया। 1879 के आरंभ से उनके दल ने बड़े विद्रोह के लिए धन जुटाने हेतु पुणे के आसपास के गाँवों में साहूकारों के घरों और सरकारी ख़ज़ानों पर छापे मारे, और कुछ सप्ताह स्वयं पुणे भी सहमा रहा।
02बंदी और अदन
20 जुलाई 1879 को कलादगी ज़िले (आज कर्नाटक) के देवर नावडगी में एक मंदिर में सोते हुए वे पकड़े गए। पुणे में मुक़दमे के बाद उन्हें आजीवन कालापानी की सज़ा देकर अदन की जेल भेजा गया। फ़रवरी 1883 में वे भाग निकले, फिर पकड़े गए, और उन्होंने अन्न त्याग दिया। 17 फ़रवरी 1883 को अदन में उनका देहांत हुआ। महाराष्ट्र उन्हें आधुनिक भारत में सशस्त्र क्रांति का जनक कहता है; 1984 में उन पर डाक टिकट जारी हुआ।

