01ऊपर के कमरे में मृत्यु
जुलाई 1896 में मदुरै में चाचा के घर अकेले बैठे उस विद्यार्थी को अचानक मृत्यु का भय पकड़ लिया। वे लेट गए, साँस रोकी, शरीर को शव की तरह अकड़ने दिया और पूछा कि यह मरता कौन है। शरीर जल जाएगा, पर ‘मैं’ अछूता रहा। वह बोध फिर कभी नहीं गया। 29 अगस्त को वे यह पर्ची छोड़कर घर से निकल गए कि पिता की खोज में जा रहे हैं, और 1 सितम्बर 1896 को तिरुवण्णामलै के अरुणाचलेश्वर मंदिर में खड़े थे।
02पहाड़ी पर चौवन वर्ष
वर्षों वे मौन बैठे रहे, पहले मंदिर के भूमिगत पाताल लिंग में, फिर पहाड़ी की गुफ़ाओं में; 1899 से 1916 तक विरूपाक्ष गुफ़ा में, फिर स्कन्दाश्रम में, और 1922 से अरुणाचल की तलहटी में अपनी माँ की समाधि के पास के आश्रम में। विद्वान गणपति मुनि ने 1907 में उन्हें ‘भगवान श्री रमण महर्षि’ नाम दिया। साधकों के प्रश्नों का उत्तर वे आत्म-विचार से देते: ‘मैं’ के विचार को उसके स्रोत तक खोजो। अरुणाचल पर उनके स्तोत्र आश्रम में रोज़ गाए जाते हैं। 14 अप्रैल 1950 की संध्या को वहीं उन्होंने देह त्यागी।


