चित्र: 1589 author · Public domain
रानी

रानी दुर्गावती

गढ़ा-मंडला की रानी, मुग़लों से लड़ते हुए वीरगति

1524 ई.—1564 ई.

1524–1564 ई.

गढ़ा के गोंड राजवंश में ब्याही चंदेल राजकुमारी दुर्गावती ने अपने अल्पवयस्क पुत्र के लिए चौदह वर्ष राज चलाया और 24 जून 1564 को जबलपुर के पास नरई में आसफ़ खाँ की मुग़ल सेना से लड़ते हुए प्राण दिए।

01गढ़ा की संरक्षिका

दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर में, खजुराहो के निर्माता चंदेलों के वंश में हुआ। उनका विवाह गढ़ा-मंडला के गोंड राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुआ। लगभग 1550 में दलपत शाह का देहांत हुआ और वे पुत्र वीर नारायण की ओर से राज चलाने लगीं। अबुल फ़ज़ल उनके राज्य को समृद्ध बताता है, जिसमें हज़ारों गाँव और युद्ध-हाथियों की बड़ी सेना थी। उन्होंने सिंगौरगढ़ से राज चलाया, सतपुड़ा की पहाड़ियों में चौरागढ़ को अपना गढ़ बनाए रखा, जबलपुर के आसपास जलाशय बनवाए, जिनमें रानीताल आज भी उनका नाम लिए है, और मालवा के बाज़ बहादुर के धावे लौटाए।

02नरई, 24 जून 1564

1564 में कड़ा के मुग़ल हाकिम आसफ़ खाँ ने बड़ी सेना लेकर गढ़ा पर चढ़ाई की। दुर्गावती हाथी पर सवार होकर रण में उतरीं और नरई की संकरी घाटी में पहले दिन की लड़ाई जीतीं। अगले दिन मुग़ल तोपें आ पहुँचीं और बाढ़ से भरे नाले ने पीछे हटने का रास्ता काट दिया; उनकी आँख और गर्दन में तीर लगे। बंदी होने के बजाय उन्होंने अपनी कटार अपने सीने में उतार ली। कुछ ही समय बाद वीर नारायण चौरागढ़ की रक्षा में वीरगति को प्राप्त हुए। जबलपुर के पास बरेला में उनकी समाधि है, और मध्य प्रदेश में 24 जून उनके बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

कालिंजर दुर्ग
स्थान · प्राचीन पहाड़ी दुर्ग; परकोटा और नीलकण्ठ मन्दिर मुख्यतः चन्देल, 9वीं–12वीं शताब्दीकालिंजर दुर्गबुन्देलखण्ड की एक समतल-शिखर विन्ध्य पहाड़ी, जो विष धारण करने वाले नीलकण्ठ शिव को समर्पित है। चन्देलों के इस महादुर्ग को महमूद ग़ज़नवी ने घेरा, क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने लिया, और यहीं शेरशाह की मृत्यु हुई।पढ़ें →