01गुलाब सिंह और ज़ोरावर सिंह
गुलाब सिंह और उनके भाई ध्यान सिंह और सुचेत सिंह लाहौर दरबार में ऊँचे पदों तक पहुँचे, और 1822 में अखनूर में रणजीत सिंह ने स्वयं तिलक लगाकर गुलाब सिंह को जम्मू का राजा बनाया। 1834 से उनके सेनापति ज़ोरावर सिंह छोटी डोगरा सेनाएँ ऊँचे दर्रों से लद्दाख ले गए, फिर 1840 में बल्तिस्तान, और 1841 में मानसरोवर के पास तकलाकोट तक पश्चिमी तिब्बत में। जाड़े और तिब्बती पलटवार में घिरकर दिसम्बर 1841 में तोयो में ज़ोरावर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। 1842 की चुशूल सन्धि में लद्दाख जम्मू के पास रहा।
021846 की अमृतसर सन्धि
पहले आंग्ल-सिख युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने युद्ध-हर्जाने के रूप में लाहौर से कश्मीर लिया, और 16 मार्च 1846 की अमृतसर सन्धि से उसे पचहत्तर लाख रुपये में गुलाब सिंह को सौंप दिया। जम्मू, कश्मीर, लद्दाख और बीच का पहाड़ी देश पहली बार एक शासक के अधीन जुड़ा। उनके पुत्र रणबीर सिंह ने 1860 में जम्मू का रघुनाथ मन्दिर पूरा किया, वहाँ अनुवाद-विभाग और संस्कृत पुस्तकालय खोला, और रणबीर दण्ड विधि नाम की विधि-संहिता चलाई। उन्हीं के समय गिलगित डोगरा अधिकार में आया।

03हरि सिंह और 1947
1925 में हरि सिंह गद्दी पर बैठे। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान-समर्थित क़बायली लश्करों ने राज्य पर आक्रमण किया और बारामूला तक पहुँच गए; तब 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने भारत में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए, और अगली सुबह भारतीय सेना विमान से श्रीनगर उतरी। 1949 में उन्होंने राज्य छोड़ा, और 1952 में राज्य की संविधान सभा ने राजतन्त्र औपचारिक रूप से समाप्त किया।
शासक
- 1गुलाब सिंह1822 में जम्मू के राजा; 1846 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा1822–1857
- 2रणबीर सिंहजम्मू का रघुनाथ मन्दिर पूरा किया1857–1885
- 3प्रताप सिंह1885–1925
- 4हरि सिंह26 अक्टूबर 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर1925–1952
उनकी विरासत
- जम्मू का रघुनाथ मन्दिर और उसका पाण्डुलिपि-पुस्तकालय
- ज़ोरावर सिंह के अभियानों से भारत से जुड़ा लद्दाख
- 1846 में एक इकाई के रूप में जम्मू-कश्मीर राज्य
- 1947 का विलय-पत्र














