3 अप्रैल 1858 को रोज़ ने नगर पर धावा बोलकर उसे ले लिया; रानी रात में अपने पुत्र के साथ घेरा तोड़कर कालपी की ओर निकल गईं।
01मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी
राजा गंगाधर राव नवंबर 1853 में दामोदर राव नाम के बालक को गोद लेकर चल बसे। लॉर्ड डलहौज़ी ने गोद को अमान्य किया और 1854 में झाँसी हड़प ली; रानी को पेंशन देकर अलग कर दिया गया। जून 1857 में जब झाँसी की छावनी उठी, उन्होंने राज्य की बागडोर सँभाली, सेना भर्ती की और तोपें ढलवाईं। सर ह्यू रोज़ की सेंट्रल इंडिया फ़ील्ड फ़ोर्स 21 मार्च 1858 को झाँसी पहुँची और दीवारों पर गोले बरसाने लगी। स्त्रियाँ तोपख़ानों तक गोले और पानी ढोती रहीं; किले की बड़ी तोपें दिनों तक अंग्रेज़ों को जवाब देती रहीं।
02बेतवा और घेरा-तोड़
लगभग 20,000 सैनिकों के साथ तात्या टोपे नगर की सहायता को आए, पर रोज़ ने अपनी सेना का एक भाग उनकी ओर मोड़ा और 1 अप्रैल को बेतवा पर उन्हें हरा दिया। 3 अप्रैल को अंग्रेज़ों ने दीवारों पर धावा बोला और घर-घर लड़ते हुए नगर में घुसे; बहुत से नगरवासी मारे गए। 4 अप्रैल की रात दामोदर राव को पीठ पर बाँधकर रानी कुछ घुड़सवारों के साथ घेरा काटकर निकलीं और रात भर घोड़ा दौड़ाकर सौ मील से अधिक दूर कालपी पहुँचीं।

झाँसी की रक्षा ने रानी लक्ष्मीबाई को 1857 की सबसे प्रिय नायिका बना दिया, और किले से उनकी छलाँग देश की स्मृति का अंग बन गई।

