01ताना और वन
तलाजा में जन्मे नरसिंह बचपन में माता-पिता को खोकर बड़े भाई के घर पले, और कोई काम न करने वाले भावुक युवक थे। एक दिन भाभी के ताने से आहत होकर वे वन में निकल गए, परम्परा के अनुसार गोपनाथ के पास एक पुराने शिवलिंग तक, और सात दिन बिना अन्न बैठे रहे। महादेव प्रकट हुए, वर माँगने को कहा, और जब नरसिंह ने वही माँगा जो शिव को सबसे प्रिय है, तो वे उन्हें श्रीकृष्ण की रासलीला दिखाने ले गए। लौटे तो गायक बनकर लौटे।
02जूनागढ़ और हुंडी
जूनागढ़ में वे निर्धन रहे और हर किसी के साथ बैठकर भजन गाते, जिसे उनकी जाति के लोग बुरा मानते। उनके जीवन की कथाएँ आज भी पूरे गुजरात में सुनाई जाती हैं। बेटी के घर मामेरू भेजने को पैसे न थे, तो श्रीकृष्ण स्वयं सामान लेकर पहुँचे। तीर्थयात्रियों ने उन्हें धन देकर द्वारका की हुंडी ली, तो वहाँ शामळशा सेठ नाम के व्यापारी ने उसे चुकाया, और गुजरात जानता है कि शामळशा कौन थे। जहाँ वे गाते थे, वह ‘नरसिंह मेहता नो चोरो’ जूनागढ़ में आज भी है।

“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे।”
Narsinh Mehta, pad “Vaishnav Jan To”