चित्र: Snehrashmi · CC BY-SA 4.0
संत

नरसिंह मेहता

जूनागढ़ के कृष्णभक्त, गुजराती के आदिकवि

1414 ई.—1481 ई.

लगभग 1414–1481 ई.

जूनागढ़ के नागर ब्राह्मण नरसिंह मेहता ने गुजराती प्रभातियों और पदों में श्रीकृष्ण को गाया, और गुजरात उन्हें अपना आदिकवि कहता है। उनका ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ महात्मा गांधी की नित्य प्रार्थना बना।

“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे।”Narsinh Mehta, pad “Vaishnav Jan To”

01ताना और वन

तलाजा में जन्मे नरसिंह बचपन में माता-पिता को खोकर बड़े भाई के घर पले, और कोई काम न करने वाले भावुक युवक थे। एक दिन भाभी के ताने से आहत होकर वे वन में निकल गए, परम्परा के अनुसार गोपनाथ के पास एक पुराने शिवलिंग तक, और सात दिन बिना अन्न बैठे रहे। महादेव प्रकट हुए, वर माँगने को कहा, और जब नरसिंह ने वही माँगा जो शिव को सबसे प्रिय है, तो वे उन्हें श्रीकृष्ण की रासलीला दिखाने ले गए। लौटे तो गायक बनकर लौटे।

02जूनागढ़ और हुंडी

जूनागढ़ में वे निर्धन रहे और हर किसी के साथ बैठकर भजन गाते, जिसे उनकी जाति के लोग बुरा मानते। उनके जीवन की कथाएँ आज भी पूरे गुजरात में सुनाई जाती हैं। बेटी के घर मामेरू भेजने को पैसे न थे, तो श्रीकृष्ण स्वयं सामान लेकर पहुँचे। तीर्थयात्रियों ने उन्हें धन देकर द्वारका की हुंडी ली, तो वहाँ शामळशा सेठ नाम के व्यापारी ने उसे चुकाया, और गुजरात जानता है कि शामळशा कौन थे। जहाँ वे गाते थे, वह ‘नरसिंह मेहता नो चोरो’ जूनागढ़ में आज भी है।

द्वारकाधीश मन्दिर, द्वारका
स्थान · परम्परा के अनुसार पहला मन्दिर श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने बनवाया; वर्तमान मन्दिर अधिकतर 15वीं–16वीं शताब्दी काद्वारकाधीश मन्दिर, द्वारकाचार धाम का पश्चिमी धाम, गोमती तट पर श्रीकृष्ण की नगरी, जहाँ पाँच तल वाले जगत मन्दिर पर ध्वजा दिन में कई बार बदली जाती है।पढ़ें →

“वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे।”

Narsinh Mehta, pad “Vaishnav Jan To”