01धर्मचक्र प्रवर्तन
बोधगया में ज्ञान पाने के बाद बुद्ध काशी के बाहर मृगदाव में उन पाँच तपस्वियों को खोजने गए जो कभी उनके साथ साधना करते थे, और उन्हें चार आर्य सत्य और मध्यम मार्ग सिखाया। बौद्ध इसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहते हैं। लगभग 250 ई.पू. अशोक ने यहाँ चमकाए गए बलुआ पत्थर का स्तम्भ खड़ा किया, जिसके शीर्ष पर चक्र के ऊपर पीठ से पीठ सटाए चार सिंह हैं। जैन भी सारनाथ को ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि के रूप में पूजते हैं। 7वीं शताब्दी में ह्वेनसांग ने यहाँ लगभग पन्द्रह सौ भिक्षु देखे।
02ध्वस्त, खोदा गया, फिर मिला
12वीं शताब्दी में गहड़वाल राजा गोविन्दचन्द्र की रानी कुमारदेवी ने यहाँ एक विशाल विहार बनवाया, जो उनके अभिलेख में दर्ज है। वह अन्तिम था। 1194 में बनारस लेने वाली ग़ोरी सेनाओं ने सारनाथ उजाड़ दिया, और भिक्षु बिखर गए। 1794 में बनारस के राजा के दीवान जगत सिंह ने ईंटों के लिए धर्मराजिका स्तूप तुड़वाया और भीतर अस्थि-मंजूषा पाई। अलेक्ज़ेण्डर कनिंघम ने 1835 से उत्खनन किया, और 1904–05 में एफ़. ओ. ओरटेल ने अपने स्तम्भ से टूटा सिंह-शीर्ष खोद निकाला। 26 जनवरी 1950 को यह ‘सत्यमेव जयते’ के साथ भारत का राजचिह्न बना; उसका चक्र राष्ट्रध्वज के बीच में है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 250 ई.पू.अशोक सिंह-स्तम्भ और स्तूप खड़ा करते हैं।
- 12वीं शताब्दीरानी कुमारदेवी धर्मचक्रजिन विहार बनवाती हैं।
- 1194ग़ोरी सेनाएँ सारनाथ उजाड़ती हैं।
- 1794जगत सिंह ईंटों के लिए धर्मराजिका स्तूप तुड़वाते हैं।
- 1904–05एफ़. ओ. ओरटेल सिंह-शीर्ष खोद निकालते हैं।
- 26 जनवरी 1950सिंह-शीर्ष भारत का राजचिह्न बनता है।
सिंह-शीर्ष स्थल पर ASI पुरातत्व संग्रहालय में है (शुक्रवार बन्द)। सारनाथ वाराणसी से 10 किलोमीटर है; बुद्ध पूर्णिमा मुख्य पर्व है।







