चित्र: Manjunath Doddamani Gajendragad at en.wikipedia · Public domain
शासक

विक्रमादित्य षष्ठ

कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य सम्राट

शासन 1076–1126 ई.

विक्रमादित्य षष्ठ त्रिभुवनमल्ल ने पचास वर्ष कल्याणी से पश्चिमी चालुक्य साम्राज्य पर राज किया और 1076 में अपने राज्यारोहण से एक नया संवत चलाया, चालुक्य-विक्रम संवत। उनके दरबार ने भारत को बिल्हण का विक्रमांकदेवचरित और विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा दी, याज्ञवल्क्य स्मृति की वह टीका जो आज भी हिन्दू पारिवारिक विधि को आकार देती है।

01छोटा भाई

वे सोमेश्वर प्रथम के दूसरे पुत्र थे। बिल्हण बताते हैं कि पिता विक्रमादित्य को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे, पर राजकुमार ने बड़े भाई को लाँघने से मना कर दिया। 1068 में सोमेश्वर द्वितीय राजा बने, उनसे झगड़े और चोलों का सहारा लिया। 1076 में विक्रमादित्य ने उन्हें हटा दिया। उनका विवाह चोल राजा वीरराजेन्द्र की पुत्री से हुआ था, और 1070 के चोल उत्तराधिकार में वे कुलोत्तुंग से पिछड़ गए, जिनसे फिर वर्षों तक दक्कन के लिए संघर्ष चला। उनके अधीन सामन्त शक्तिशाली हुए, सबसे बढ़कर होयसल विष्णुवर्धन, पर उनके जीते जी सामन्त ही रहे।

02कल्याणी का दरबार और मन्दिर

बिल्हण कश्मीर से आए और अपने आश्रयदाता पर अठारह सर्गों का विक्रमांकदेवचरित लिखा। विज्ञानेश्वर ने कल्याणी में मिताक्षरा लिखी; जन्म से उत्तराधिकार के उसके नियम आधुनिक न्यायालयों तक भारत के अधिकतर हिन्दू परिवारों पर लागू रहे। उनके शासन के कन्नड़ अभिलेख सैकड़ों में हैं। कल्याणी चालुक्य शैली के मन्दिर तुंगभद्रा अंचल में फैले; कोप्पल जिले के इटगी में उनके सेनापति महादेव ने 1112 में महादेव मन्दिर बनवाया, जिसे वहाँ का अभिलेख मन्दिरों का सम्राट कहता है।

कल्याणी के चालुक्य
राजवंश · 973–लगभग 1189 ई.कल्याणी के चालुक्यराष्ट्रकूटों के सामन्त तैलप द्वितीय ने 973 में अपने स्वामियों को हटाया और पुराने चालुक्य नाम को फिर जगाया। उसके वंश ने सौ वर्ष तक चोलों से युद्ध किया और कल्याणी से दक्कन पर राज किया।पढ़ें →