भारत का विज्ञान

गणित, खगोल, चिकित्सा, धातुकर्म, व्याकरण और अभियान्त्रिकी: क्या उपलब्धि हुई, कौन से ग्रन्थ, अभिलेख और वस्तुएँ उसे प्रमाणित करती हैं, वह कैसे फैली, और विद्वान आज भी किस पर विचार करते हैं।

34विज्ञान

गणित

स्थानीय मान और शून्य: प्रमाण458 ई. (लोकविभाग); 876 ई. (ग्वालियर)स्थानीय मान और शून्य: प्रमाणदस चिह्नों से कोई भी संख्या लिखना, जिसमें चिह्न का मान उसके स्थान से तय हो और ख़ाली स्थान पर शून्य लगे, भारत का सबसे प्रसिद्ध उपहार है।शून्य और ऋण के ब्रह्मगुप्त के नियम628 ई.शून्य और ऋण के ब्रह्मगुप्त के नियम628 ई.भास्कर प्रथम और ज्या का सूत्र629 ई.भास्कर प्रथम और ज्या का सूत्रआर्यभट के सबसे महत्त्वपूर्ण आरंभिक टीकाकार भास्कर प्रथम ने एक सरल भिन्न दिया जो बिना सारणी के किसी कोण की ज्या एक प्रतिशत से कम त्रुटि के साथ निकाल देता है।भास्कराचार्य और लीलावती1150 ई.भास्कराचार्य और लीलावतीभास्कराचार्य के 1150 ई.माधव और केरल परंपरालगभग 1340–1425 ई. (माधव) से लगभग 1530 (युक्तिभाषा) तकमाधव और केरल परंपरानिळा नदी के किनारे के गाँवों में संगमग्राम के माधव से चली गुरु-परंपरा ने पाई, ज्या और कोटिज्या की अनंत श्रेणियाँ निकालीं और उनकी उपपत्ति भी लिखी, न्यूटन और लाइबनिज़ से दो सदी पहले।भद्र-गणित: खजुराहो और नारायण पंडित10वीं शताब्दी खजुराहो; गणित कौमुदी 1356 ई.भद्र-गणित: खजुराहो और नारायण पंडितखजुराहो के एक जैन मंदिर पर खुदे 4 × 4 वर्ग की हर पंक्ति, स्तंभ, विकर्ण और टूटे विकर्ण का योग 34 है।शुल्बसूत्रों की ज्यामितिवैदिक काल, वेदांग के कल्पसूत्रशुल्बसूत्रों की ज्यामितिशुल्बसूत्र यज्ञ-वेदियाँ बनाने के लिए रस्सी से नापने की नियमावली हैं।पिंगल का छंदःशास्त्रपिंगल, छंदःशास्त्र; हलायुध की टीका, 10वीं शताब्दी ई.पिंगल का छंदःशास्त्रहर संभव छंद गिनने के लिए पिंगल ने अक्षरों को लघु और गुरु माना और ऐसे नियम दिए जो प्रतिरूप को संख्या में और संख्या को फिर प्रतिरूप में बदलते हैं।

खगोल

आर्यभट का खगोल-विज्ञान499 ई.आर्यभट का खगोल-विज्ञानकुसुमपुर में रचे 121 श्लोकों में आर्यभट ने घूमती पृथ्वी, छाया से समझाए ग्रहण, ज्या-सारणी और चार दशमलव तक पाई दिया।सिद्धांत ग्रंथ और उज्जैन की मध्याह्न रेखापंचसिद्धांतिका, आरंभ-बिंदु 505 ई.सिद्धांत ग्रंथ और उज्जैन की मध्याह्न रेखा5वीं शताब्दी से भारतीय ज्योतिष सिद्धांतों के रूप में लिखा गया: पूर्ण पद्धतियाँ जो किसी भी दिन सूर्य, चंद्र और ग्रहों की स्थिति निकालती हैं।जयसिंह की वेधशालाएँ1724 ई. सेजयसिंह की वेधशालाएँआमेर के सवाई जयसिंह द्वितीय ने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में पत्थर की पाँच वेधशालाएँ बनाईं, जिनके यंत्र इतने बड़े हैं कि उन पर छाया चलती दिखती है।वेवैदिक काल, लगध को समर्पितवेदांग ज्योतिषपूरी तरह ज्योतिष को समर्पित सबसे पुराना भारतीय ग्रंथ, जो यज्ञ के दिन तय करने के लिए रखा गया।

चिकित्सा

मेहरगढ़ के छेदे हुए दाँतलगभग 7500–5500 ई.पू.मेहरगढ़ के छेदे हुए दाँतमेहरगढ़ की क़ब्रों से मिली ग्यारह दाढ़ों में जीवित लोगों के दाँतों में सधे हुए छेद हैं, जो संसार में कहीं भी दंत-चिकित्सा का सबसे पुराना ज्ञात प्रमाण है।हाथी और घोड़ों की चिकित्साअशोक का शिलालेख लगभग 257 ई.पू.; हस्त्यायुर्वेद और शालिहोत्र ग्रंथहाथी और घोड़ों की चिकित्साभारत ने हाथी और घोड़ों के उपचार के अलग शास्त्र रखे, वे पशु जिनसे युद्ध जीते जाते थे।चरक संहिताअग्निवेश का तंत्र, चरक द्वारा संपादित, दृढ़बल द्वारा पूर्णचरक संहिताआयुर्वेद में कायचिकित्सा का महाग्रंथ, आठ स्थानों और 120 अध्यायों में।सुश्रुत की शल्य-चिकित्सासुश्रुत संहिता; सबसे पुरानी तिथियुक्त पांडुलिपि 878 ई.सुश्रुत की शल्य-चिकित्सासुश्रुत संहिता आयुर्वेद का महान शल्य-ग्रंथ है।योग एक अनुशासन: पतंजलि के सूत्रमहर्षि पतंजलि का योगसूत्र; व्यास भाष्ययोग एक अनुशासन: पतंजलि के सूत्र195 सूत्रों में पतंजलि ने योग को चित्त को शांत करने की विधि के रूप में रखा, यम से समाधि तक आठ अंगों के साथ।

धातुकर्म

मधूच्छिष्ट विधान: नर्तकी से स्वामीमलै तकलगभग 2500 ई.पू. से आज तकमधूच्छिष्ट विधान: नर्तकी से स्वामीमलै तकमोहनजोदड़ो की काँसे की नर्तकी मोम में प्रतिमा गढ़कर, उस पर मिट्टी चढ़ाकर और मोम पिघलने से बनी जगह में धातु ढालकर बनी।वूट्ज़: दक्षिण का मूषा-इस्पातईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी के उत्तरार्ध से (कोडुमणल)वूट्ज़: दक्षिण का मूषा-इस्पातदक्षिण भारत के लोहार लोहे और वनस्पति को मिट्टी की मूषाओं में बंद करके पिघलाते थे और उच्च-कार्बन इस्पात की छोटी टिकियाँ बनाते थे।लोहे का स्तंभ जिसमें जंग नहीं लगतालगभग 375–415 ई. (चंद्रगुप्त द्वितीय का राज्यकाल)लोहे का स्तंभ जिसमें जंग नहीं लगतासात मीटर से ऊँचा और लगभग छह टन का गढ़ा हुआ लोहे का स्तंभ, जो लगभग सोलह सदियों से महरौली में खुले में खड़ा है और उस पर लगभग जंग नहीं है।ज़ावर का जस्ताखनन लगभग 2,000 वर्ष पहले से; भट्ठियाँ लगभग 16वीं शताब्दीज़ावर का जस्ताजस्ता दूसरी धातुओं की तरह गलाए जाने से पहले ही भाप बन जाता है।

अभियान्त्रिकी

हड़प्पाई नगर-नियोजन और नालियाँलगभग 2600–1900 ई.पू.हड़प्पाई नगर-नियोजन और नालियाँसिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगर खंडों में बसाए गए, एक ही मानक अनुपात की ईंटों से बने, और गलियों के नीचे ढकी नालियों से उनका पानी निकलता था, सार्वजनिक स्वच्छता का ऐसा स्तर जो कई सदियों तक फिर नहीं दिखा।लोथल का जलकुंडलगभग 2300–1900 ई.पू.लोथल का जलकुंडगुजरात के हड़प्पाई बंदरगाह लोथल के पास 200 मीटर से लंबा ईंटों का कुंड, जिसे उसके उत्खननकर्ता ने संसार की सबसे पुरानी ज्ञात गोदी माना।जहाज़ और मानसूनी समुद्रहड़प्पा काल से 16वीं शताब्दी तकजहाज़ और मानसूनी समुद्रभारतीय नाविक मानसूनी हवाओं से सिले हुए जहाज़ों में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी पार करते थे।बाँध और सरोवर: सुदर्शन और कल्लणैसुदर्शन मौर्य काल से, मरम्मत 150 और 456 ई.; कल्लणै, करिकाल चोलबाँध और सरोवर: सुदर्शन और कल्लणैजूनागढ़ की एक चट्टान आठ सदियों तक एक बँधे सरोवर का जीवन दर्ज करती है, और करिकाल चोल को समर्पित कावेरी पर पत्थर का बाँध आज भी डेल्टा के खेतों तक पानी मोड़ता है।मंदिर-निर्माण की अभियांत्रिकीकैलास, 8वीं शताब्दी; बृहदीश्वर, 1010 ई.मंदिर-निर्माण की अभियांत्रिकीशिल्प और वास्तु ग्रंथों ने मंदिर-निर्माताओं को अनुपात का शास्त्र दिया, और स्थपतियों ने उससे तंजावुर में 66 मीटर का ग्रेनाइट शिखर उठाया और एलोरा में पहाड़ को ऊपर से नीचे काटकर पूरा मंदिर निकाला।बावड़ियाँ: वाव और बावड़ीरानी की वाव, लगभग 1063 ई.; चाँद बावड़ी, 9वीं शताब्दीबावड़ियाँ: वाव और बावड़ीभारत के सूखे पश्चिम में कुएँ इमारतें बन गए: सीढ़ियों की लंबी पंक्तियाँ और खंभों वाली मंज़िलें, जो ऋतु के साथ घटते-बढ़ते पानी तक नीचे जाती हैं।