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“सुश्रुत की शल्य-चिकित्सा.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/vijnana/sushruta-samhita-surgery/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). सुश्रुत की शल्य-चिकित्सा. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/vijnana/sushruta-samhita-surgery/
01उपकरण और अभ्यास
काशी में दिवोदास धन्वंतरि के सुश्रुत को उपदेश के रूप में रचे इस ग्रंथ में पाँच स्थान और बाद का उत्तरतंत्र हैं, कुल 186 अध्याय। सूत्रस्थान 7 और 8 में 101 कुंद यंत्र, जिनमें कई पशु-पक्षियों की चोंच जैसे हैं, और 20 तीक्ष्ण शस्त्र बताए गए हैं। अध्याय 9 शिष्य से रोगी को छूने से पहले लौकी और ककड़ी पर चीरा, रोएँदार खाल पर खुरचना, मृत पशुओं की शिराओं में वेधन और कपड़े तथा चमड़े पर सिलाई का अभ्यास कराता है। शारीरस्थान 5 बताता है कि सात दिन बहते पानी में गले शव से शरीर-रचना कैसे सीखें।
02नाक, कान और 1794 का पत्र
सूत्रस्थान 16 कटी नाक को गाल की पत्ते के आकार की, जुड़ी छोड़ी गई त्वचा से फिर बनाता है, और फटे कर्ण-पालि की मरम्मत बताता है। नाक काटना आम दंड था, इसलिए इस शल्य की माँग थी, और शल्यकारों के परिवारों ने इसे सदियों सँभाला। अक्टूबर 1794 में लंदन की जेंटलमैन्स मैगज़ीन ने बी. एल. के हस्ताक्षर वाला पत्र छापा, जिसमें पुणे के पास कंपनी की सेना के बैलगाड़ीवान कावसजी की माथे की त्वचा से हुई नासिका-संधान शल्य का वर्णन था। जोसेफ़ कार्प्यू ने लंदन में यह विधि आज़माई और 1816 में दो मामले छापे; यह यूरोपीय शल्य की “भारतीय विधि” बनी।
03पांडुलिपियाँ और काल
सुश्रुत संहिता की सबसे पुरानी तिथियुक्त पांडुलिपि नेपाल की 878 ई. की ताड़पत्र प्रति है, जो अब काठमांडू के कैसर पुस्तकालय में है। 12वीं शताब्दी की डल्हण की टीका इस ग्रंथ की मानक व्याख्या है। 987 की इब्न अल-नदीम की फ़ेहरिस्त बताती है कि भारतीय वैद्य मंका ने बग़दाद में बरमकियों के लिए “सुस्रुद” की पुस्तक का अनुवाद किया। विद्वान ग्रंथ के मूल का काल बहुत भिन्न-भिन्न बताते हैं और मानते हैं कि इसका प्रतिसंस्कार हुआ; आज की सुश्रुत संहिता एक बाद के संपादक का रूप है, जिसे परंपरा नागार्जुन कहती है।
ग्रन्थों में
- सुश्रुत संहिता
- डल्हण का निबंधसंग्रह



