01विदुर के वचन
हस्तिनापुर के महल में धृतराष्ट्र भूमि पर पड़े थे, उनके सौ पुत्र मारे जा चुके थे। विदुर ने उन्हें उठाया। उन्होंने कहा, जो संचित होता है उसका अन्त क्षय है, जो ऊँचा उठता है उसका अन्त पतन, हर मिलन का अन्त बिछोह और हर जीवन का अन्त मृत्यु। फिर उन्होंने कुएँ में लटके मनुष्य का दृष्टान्त सुनाया। घने वन में हिंसक पशुओं से भागता एक ब्राह्मण एक गड्ढे में गिरा और एक लता पकड़कर लटक गया। नीचे विशाल सर्प था, ऊपर हाथी, और सफ़ेद-काले चूहे लता कुतर रहे थे। ऊपर छत्ते से मधु की बूँदें उसके मुँह में टपक रही थीं, और वह उन्हें पीता रहा। विदुर बोले, वह वन संसार है, और चूहे दिन और रात हैं।
02लोहे का भीम
व्यास भी आए और देवताओं के विधान की बात कही, कि पृथ्वी का भार उतारने के लिए यह युद्ध बहुत पहले निश्चित हो चुका था। फिर धृतराष्ट्र कुरुकुल की विधवाओं के साथ रणभूमि की ओर चले। मार्ग में उन्हें कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा मिले, जिन्होंने रात का कर्म बताया और अपनी-अपनी राह चले गए। पाण्डव प्रणाम करने आए, तो वृद्ध राजा ने भीम को गले लगाना चाहा। श्रीकृष्ण उनके मन को जानते थे और भीम की लोहे की प्रतिमा आगे कर दी। धृतराष्ट्र ने उसे बाँहों में भींचकर चूर-चूर कर दिया, फिर यह सोचकर रोने लगे कि भीम को मार डाला। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें सच बताया।
03गान्धारी की दृष्टि
गान्धारी युधिष्ठिर को शाप देना चाहती थीं। व्यास पहले ही उनके पास पहुँचे और उन्हें अपने ही वचन याद दिलाए, जो वे युद्ध के हर दिन दुर्योधन से कहती थीं: जहाँ धर्म है, वहीं जय है। गान्धारी रुक गईं। भीम ने अपनी बात रखी, जंघा पर प्रहार की और उस रक्त की जिसे पीने की शपथ ली थी, और कहा कि वह रक्त उनके दाँतों से आगे नहीं गया। युधिष्ठिर हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हुए और शाप माँगा। आँखों की पट्टी के एक छोर से उनकी दृष्टि युधिष्ठिर के पैरों की उँगलियों पर पड़ी, और उनके नख झुलसकर काले हो गए।
04रणभूमि में स्त्रियाँ
व्यास ने गान्धारी को दिव्य दृष्टि दी, और जहाँ वे खड़ी थीं वहीं से उन्होंने पूरी कुरुक्षेत्र-भूमि देखी। कुरु और पांचाल कुलों की स्त्रियाँ शवों के बीच अपनों को खोज रही थीं, और गीदड़ और गिद्ध लाशों के बीच घूम रहे थे। गान्धारी जो देखती गईं, श्रीकृष्ण से कहती गईं। गदा के पास पड़ा दुर्योधन। फटी छाती वाला दुःशासन। अभिमन्यु पर विलाप करती उत्तरा। कर्ण पर रोती उसकी पत्नी। जयद्रथ की पत्नी, उनकी अपनी पुत्री दुःशला। पत्नी कृपी के पास पड़े द्रोण। गान्धारी का यह विलाप इतिहास के सबसे करुण अंशों में है।
05श्रीकृष्ण को शाप
फिर गान्धारी श्रीकृष्ण की ओर मुड़ीं। तुम इसे रोक सकते थे, उन्होंने कहा, और तुमने नहीं रोका। पति-सेवा से जो भी पुण्य मैंने कमाया है, उसके बल पर तुम्हें शाप देती हूँ: आज से छत्तीसवें वर्ष में तुम अपने ही बन्धुओं को एक-दूसरे का वध करते देखोगे, वन में अकेले देह छोड़ोगे, और तुम्हारे कुल की स्त्रियाँ ऐसे ही रोएँगी जैसे ये रो रही हैं। श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले कि मैं जानता था कि ऐसा ही होगा। वृष्णियों का नाश उनके अपने सिवा कोई नहीं कर सकता; आपने वही कहा जो पहले से निश्चित था।
06मृतकों को जलांजलि
युधिष्ठिर ने घी और चन्दन से बड़ी-बड़ी चिताएँ बनवाकर मित्र-शत्रु सबका अन्तिम संस्कार करवाया, और जिनका कोई अपना नहीं बचा था उनका भार विदुर और धौम्य ने सँभाला। फिर सब मृतकों को जल देने गंगा में उतरे। नदी में खड़े-खड़े कुन्ती ने पुत्रों से कहा कि कर्ण को भी जल दो, क्योंकि वह तुम्हारा सबसे बड़ा भाई था, विवाह से पहले सूर्यदेव से उत्पन्न मेरा पुत्र। पाण्डव यह सुनकर टूट गए। युधिष्ठिर ने शोक किया कि उन्होंने अपने ही भाई को मरवाया, और अपने हाथों कर्ण को जलांजलि दी।
प्रसिद्ध श्लोक
सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥
सब संचय का अन्त क्षय है, सब उन्नति का अन्त पतन है; हर संयोग का अन्त वियोग है, और जीवन का अन्त मृत्यु है।Mahabharata 11.2.3 (BORI CE)
