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“ब्राह्मी.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/lipi/brahmi-script/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). ब्राह्मी. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/lipi/brahmi-script/
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devānapiyena piyadasina lājina
01अशोक के अक्षर
लगभग 260 ई.पू. में अशोक ने अपने धम्म-सन्देश साम्राज्य भर में चट्टानों और चमकदार स्तम्भों पर खुदवाए, गिरनार से धौली तक, लुम्बिनी से ब्रह्मगिरि तक। सुदूर पश्चिमोत्तर को छोड़ वे ब्राह्मी में हैं, बाएँ से दाएँ लिखे हुए; हर व्यंजन में ‘अ’ निहित है और दूसरे स्वर छोटी मात्राओं से जुड़ते हैं। यही अक्षर-व्यवस्था आज देवनागरी, तमिल, बांग्ला और कन्नड़ में चलती है। जैन परम्परा इस लिपि का नाम भगवान ऋषभदेव की पुत्री ब्राह्मी से जोड़ती है, जिन्हें उन्होंने लेखन सिखाया। इसके मूल पर मतभेद है: कुछ विद्वान इसे किसी सेमिटिक लिपि से निकला मानते हैं, कुछ इसे भारत में ही रची गई मानते हैं।
02क्या अशोक से पुरानी?
लंका के अनुराधापुर और तमिलनाडु के कीलाडी से ब्राह्मी अक्षरों वाले ठीकरे मिले हैं, जिन्हें उत्खननकर्ताओं ने अशोक से पहले का बताया है। इन तिथियों पर अभी बहस है। इतना निश्चित है कि मौर्य युग तक यह लिपि एक विशाल क्षेत्र में एक-सी हो चुकी थी, जिससे लगता है कि वह कुछ समय से प्रयोग में थी। गोरखपुर ज़िले का सोहगौरा ताम्रपत्र भी मौर्य काल का है और ब्राह्मी में है।
03प्रिंसेप का पठन, 1837
सदियों तक भारत में कोई अशोक के अक्षर नहीं पढ़ सकता था; चौदहवीं शताब्दी में फ़ीरोज़ शाह तुग़लक़ उनके दो स्तम्भ दिल्ली ले गया, पर उन्हें पढ़ने वाला कोई न मिला। 1837 में कलकत्ता की एशियाटिक सोसाइटी के जेम्स प्रिंसेप ने यह गुत्थी खोली। उन्होंने देखा कि साँची के दर्जनों छोटे दान-लेख एक ही दो अक्षरों पर समाप्त होते हैं, और अनुमान लगाया कि वे ‘दानं’ हैं। वहाँ से पूरी वर्णमाला खुल गई। अपने को ‘देवानंपिय पियदसि’ कहने वाले राजा की पहचान फिर लंका के ग्रन्थ दीपवंस के सहारे अशोक से हुई।









