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“ग्रन्थ लिपि.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/lipi/grantha-script/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). ग्रन्थ लिपि. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/lipi/grantha-script/
01तमिल भूमि में संस्कृत
तमिल लिपि में घ, श या ज जैसी ध्वनियों के अक्षर नहीं हैं, इसलिए संस्कृत को अपनी लिपि चाहिए थी। ‘ग्रन्थ’ की लिपि ने यह कमी पूरी की। इसका पल्लव रूप काञ्चीपुरम और मामल्लपुरम के स्मारकों पर सबसे सुन्दर दिखता है, जहाँ महेन्द्रवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन प्रथम ने अपने विरुद सुघड़, बहते अक्षरों में खुदवाए। आगे चोलों के ताम्रपत्रों में संस्कृत अंश ग्रन्थ में और तमिल अंश तमिल लिपि में, साथ-साथ लिखा गया।
02बंगाल की खाड़ी के पार
पल्लव तट के व्यापारी और पुरोहित यह लिपि समुद्र पार ले गए। दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे पुराने संस्कृत अभिलेख, वियतनाम का वो-कान्ह शिलालेख और बोर्नियो के कुटै यूप-स्तम्भ, इसी के निकट की दक्षिणी ब्राह्मी में हैं, और पल्लव अक्षरों से पुरानी खमेर, पुरानी मोन, चाम और जावा की कवि लिपि निकलीं। थाई, लाओ, बर्मी, बाली और जावानी लेखन सब इसी धारा के वंशज हैं।
03ताड़पत्र और आज
सदियों तक तमिलनाडु और केरल में वेद, आगम और आचार्यों के ग्रन्थ ताड़पत्र पर ग्रन्थ लिपि में उतारे गए; मलयालम और तिगलारी दोनों लिपियाँ इसी से निकलीं। अब छपी देवनागरी ने यह काम अधिकतर ले लिया है, पर कुछ वेदपाठशालाओं में ग्रन्थ आज भी पढ़ाई जाती है और मन्दिरों की पूजा-पोथियों में चलती है। 2014 में इसे यूनिकोड में जोड़ा गया।








