उद्धृत करें
MLA
“कुचिपुड़ी.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/kuchipudi/. देखा गया .
APA
Hindu History. (2026). कुचिपुड़ी. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/kuchipudi/
इसकी पहचान
- 01
नर्तक द्वारा बोले और गाए संवाद
- 02
दरुवु, प्रवेश-गीत
- 03
पीतल की थाली की किनारी पर तरंगम्
- 04
भामाकलापम् नृत्य-नाट्य
01सिद्धेन्द्र योगी और भामाकलापम्
गाँव की परम्परा सिद्धेन्द्र योगी को भामाकलापम् का रचयिता मानती है, यानी सत्यभामा के मान और श्रीकृष्ण के प्रति विरह का नृत्य-नाट्य; उन्होंने इसे कुचिपुड़ी के युवा ब्राह्मणों को सिखाया, जिन्होंने इसे निभाने का व्रत लिया। गाँव के परिवार, भागवतुलु, यह भी कहते हैं कि 1670 के दशक में गोलकुंडा के अबुल हसन ताना शाह ने उनका प्रदर्शन देखकर प्रसन्न हो गाँव उन्हीं को दे दिया। 20वीं शताब्दी तक स्त्री-पात्रों सहित सभी भूमिकाएँ पुरुष निभाते थे।
02संवाद, गीत और पीतल की थाली
अधिकांश शास्त्रीय नृत्यों से अलग, कुचिपुड़ी नर्तक संवाद बोल और गा भी सकता है। हर पात्र हाथ में पकड़े परदे, यवनिका, के पीछे से दरुवु, यानी आत्म-परिचय के गीत, के साथ आता है। सबसे प्रसिद्ध एकल अंग तरंगम् है, नारायण तीर्थ की कृष्णलीलातरंगिणी से: नर्तक पीतल की थाली की किनारी पर, कभी सिर पर जल-कलश रखकर, पूरी लय में नाचता है। इसकी गतियाँ भरतनाट्यम से तेज़ और अधिक गोलाई लिए होती हैं।
03गाँव से संसार तक
वेदान्तम् लक्ष्मीनारायण शास्त्री ने 20वीं शताब्दी के आरम्भ में स्त्रियों को एकल कुचिपुड़ी सिखाना शुरू किया। वेम्पटि चिन्न सत्यम् ने 1963 में चेन्नई में कुचिपुड़ी आर्ट अकादमी स्थापित की, दर्जनों नृत्य-नाट्य रचे और इस शैली को आधुनिक मंच दिया। यामिनी कृष्णमूर्ति और राजा-राधा रेड्डी दम्पति ने इसे पूरे भारत में पहचान दिलाई। कुचिपुड़ी गाँव का सिद्धेन्द्र कलाक्षेत्रम् आज भी बालक-बालिकाओं को सिखाता है, और गाँव में हर वर्ष इस नृत्य का उत्सव होता है।
