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“बांग्ला-असमिया लिपि (पूर्वी नागरी).” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/lipi/bengali-assamese-script/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). बांग्ला-असमिया लिपि (पूर्वी नागरी). प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/lipi/bengali-assamese-script/
01गौड़ी अक्षरों से
आठवीं शताब्दी से बंगाल और बिहार पर राज करने वाले, नालन्दा और विक्रमशिला के संरक्षक पाल राजाओं के ताम्रपत्रों में सिद्धम अक्षर पूर्वी ढंग से झुकने-मुड़ने लगते हैं। विद्वान इसे गौड़ी या आदि-बांग्ला लिपि कहते हैं। बारहवीं शताब्दी के सेन काल तक बहुत-से अक्षर आज की बांग्ला जैसे दिखने लगते हैं। यही लिपि संस्कृत के लिए भी चली, और पूर्व के पुराण तथा तन्त्र ताड़पत्र और तुलोट काग़ज़ पर इसी में उतारे गए।
02चर्यापद और कामरूप की लिखावट
1907 में हरप्रसाद शास्त्री को नेपाल के राजकीय पुस्तकालय में बौद्ध सिद्धाचार्यों के गीतों की एक ताड़पत्र पांडुलिपि मिली, चर्यापद। बांग्ला, असमिया, ओड़िया और मैथिली के पाठक सभी उसमें अपनी भाषा का आरम्भिक रूप पहचानते हैं। असम में अहोम दरबार और सत्रों के लिपिकों ने बुरंजियों और भागवत के लिए अपनी सुलेख-शैलियाँ विकसित कीं। आधुनिक असमिया बांग्ला वाले ही अक्षर बरतती है, ‘र’ के लिए अपने ৰ और ‘व’ के लिए ৱ के साथ।
03टाइप और पहली पोथी
पहला बांग्ला टाइप चार्ल्स विल्किन्स ने शिल्पी पंचानन कर्मकार के साथ हैलहेड के ‘ग्रामर ऑफ़ द बेंगाल लैंग्वेज’ के लिए ढाला, जो 1778 में हुगली में छपा। 1855 में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने ‘वर्णपरिचय’ प्रकाशित की, जिसने पीढ़ियों तक बांग्ला बच्चों के लिए अक्षरों का क्रम और रूप तय किया। आज यह लिपि भारत और बांग्लादेश के पच्चीस करोड़ से अधिक लोगों की लिपि है।





