01शंकरदेव और माधवदेव का मिलन
श्रीमन्त शंकरदेव ब्रह्मपुत्र के ऊपर आए और माजुली में धुवाहाट-बेलगुड़ी पर रहे। वहाँ माधवदेव नामक एक शाक्त विद्वान ने देवी को बलि के प्रश्न पर उनसे शास्त्रार्थ किया और, सहमत होकर, उनके प्रधान शिष्य बने। असम के वैष्णव उस मिलन को सत्र आन्दोलन का वास्तविक आरम्भ मानते हैं। शंकरदेव ने केवल श्रीकृष्ण की शरण का उपदेश दिया, नाम-कीर्तन द्वारा, और असम को असमिया पद्य में भागवत, बरगीत और अंकीया नाट दिए।
02सत्र का जीवन
सत्र का केन्द्र नामघर होता है, एक लम्बा प्रार्थना-भवन, जिसके सामने मणिकूट है, जहाँ मूर्ति के स्थान पर सिंहासन पर भागवत रखा जाता है। भकत, जिनमें कई बचपन से ब्रह्मचारी होते हैं, चारों ओर कुटियों की पंक्तियों में रहते हैं। अहोम राजाओं ने बड़े सत्रों को भूमि दी: औनीआटी 1653 ई. में जयध्वज सिंह के समय स्थापित हुआ, और दक्षिणपाट तथा गड़मूड़ भी अहोम काल के हैं। नामघर में जन्मा सत्रिया नृत्य संगीत नाटक अकादमी ने 2000 में भारत के शास्त्रीय नृत्यों में माना। सामागुड़ी सत्र में परिवार आज भी भावना नाटकों के मुखौटे बनाते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- सोलहवीं शताब्दी का आरम्भमाजुली के बेलगुड़ी में शंकरदेव; माधवदेव उनके शिष्य बनते हैं।
- 1653 ई.अहोम राजा जयध्वज सिंह के संरक्षण में औनीआटी सत्र की स्थापना।
- 2000 ई.संगीत नाटक अकादमी ने सत्रिया को शास्त्रीय नृत्य माना।
जोरहाट के पास निमाती घाट से कमलाबाड़ी तक नाव; नवम्बर में सत्रों की रासलीला देखने का सबसे अच्छा समय है।





