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“ध्रुपद.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/dhrupad/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). ध्रुपद. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/dhrupad/
इसकी पहचान
- 01
शब्दहीन आलाप, जोड़, झाला
- 02
चार अंग: स्थायी, अन्तरा, संचारी, आभोग
- 03
चौताल और धमार में पखावज
- 04
रुद्रवीणा
- 05
चार बानियाँ: गौहर, डागर, खंडार, नौहार
01ध्रुव पद
ध्रुवपद का अर्थ है स्थिर या अटल पद; नाट्यशास्त्र में ही नाटक में गाए जाने वाले ध्रुवा-गीतों का उल्लेख है। संगीत-सभा की विधा के रूप में ध्रुपद ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (शासन 1486–1516) के दरबार में बना, जिन्होंने ब्रजभाषा में बंदिशें रचवाईं। वृंदावन के स्वामी हरिदास और उनके शिष्य तानसेन ने इसे इसका स्वर्णयुग दिया। पुष्टिमार्गी मंदिरों में अष्टछाप कवियों के ध्रुपद-शैली के पद आज भी श्रीनाथजी के सामने गाए जाते हैं।
02आलाप और चार बानियाँ
गायक पहले बिना शब्दों के, नोम, तोम, रि जैसे अक्षरों पर, आलाप, जोड़ और झाला में राग धीरे-धीरे खोलता है, कभी लगभग घंटे भर। फिर बंदिश आती है: स्थायी, अन्तरा, संचारी और आभोग, पखावज के साथ 12 मात्राओं के चौताल या 14 के धमार में। परम्परा चार बानियाँ गिनाती है: गौहर, डागर, खंडार और नौहार। रुद्रवीणा, यानी बीन, ध्रुपद का अपना वाद्य है।
03जिन परिवारों ने इसे बचाया
जब दरबारों में ख़याल छा गया, तब ध्रुपद कुछ परिवारों में बचा रहा। डागर परिवार ने, अपनी गणना के अनुसार, इसे बीस पीढ़ियों तक निभाया: नासिर मोइनुद्दीन और नासिर अमीनुद्दीन डागर, ज़हीरुद्दीन और फ़ैयाज़ुद्दीन बन्धु, और बीनकार ज़िया मोहिउद्दीन डागर। बिहार में दरभंगा के मल्लिक परिवार ने दूसरी धारा सँभाली। 1981 में भोपाल में ध्रुपद केन्द्र स्थापित हुआ, जहाँ गुंदेचा बन्धुओं ने शिक्षा पाई। हर वसन्त में वाराणसी के तुलसी घाट पर ध्रुपद मेला रात भर चलता है।



