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“राग पद्धति.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/raga-system/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). राग पद्धति. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/raga-system/
इसकी पहचान
- 01
आरोह और अवरोह
- 02
वादी और संवादी स्वर
- 03
पकड़, जिससे राग पहचाना जाए
- 04
प्रहर और ऋतु
- 05
72 मेलकर्ता (दक्षिण), 10 थाट (उत्तर)
01जो मन को रँगे
मतंग का बृहद्देशी पहला ग्रन्थ है जो राग को पारिभाषिक शब्द के रूप में परिभाषित करता है: स्वरों की वह विशेष रचना जो लोगों के चित्त का रंजन करे। उससे पहले नाट्यशास्त्र ग्रामों से निकली जातियों से काम लेता था। 13वीं शताब्दी में देवगिरि के यादव राजा सिंघण के दरबार में शार्ङ्गदेव ने संगीतरत्नाकर लिखा, अपने से पहले का सब कुछ समेटा और 264 राग गिनाए। उत्तर और दक्षिण का यह अन्तिम साझा ग्रन्थ है।
02मेलकर्ता और थाट
17वीं शताब्दी में वेंकटमखी ने तंजावुर में लिखी चतुर्दण्डिप्रकाशिका में दिखाया कि सब सप्तकों को 72 जनक-मेलों, मेलकर्ताओं, में बाँधा जा सकता है; कर्नाटक संगीत आज भी राग इसी जाल से सिखाता है। उत्तर में विष्णु नारायण भातखंडे ने 20वीं शताब्दी के आरम्भ में घूम-घूमकर बंदिशें इकट्ठी कीं और हिन्दुस्तानी रागों को बिलावल, कल्याण, भैरव, काफ़ी जैसे दस थाटों में रखा। राग का अपना वादी-संवादी स्वर और अपना समय भी होता है।
03प्रहर, ऋतु और चित्र
भैरव भोर का राग है, यमन रात के पहले प्रहर का, मल्हार वर्षा का और बसंत वसंत ऋतु का। 15वीं शताब्दी से चित्रकारों ने हर राग को रूप दिया: मेवाड़, बूँदी, दक्कन और पहाड़ी रागमाला-चित्रों में भैरव एक तपस्वी है और तोड़ी हिरणों के बीच वीणा लिए नायिका। आज राग पुणे के सवाई गन्धर्व उत्सव, जालंधर के हरिवल्लभ और चेन्नई के दिसम्बर संगीत-मौसम में रात-रात भर सुने जाते हैं।
