तंजावुर चित्रकला

लकड़ी पर बने भक्ति-चित्र, जिनमें उभरा हुआ लेप-कार्य होता है और ऊपर सोने का वरक़ तथा काँच के नग। माखन-मटकी वाले बालकृष्ण इसका सबसे प्रिय विषय हैं।

चित्र: Unknown author · Public domain
कला
चित्रकला
तिथि
नायक काल, तंजावुर मराठाओं के समय उत्कर्ष, 17वीं–19वीं शताब्दी
क्षेत्र
तंजावुर और तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
युग
मराठा उत्कर्ष और सिख साम्राज्य
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“तंजावुर चित्रकला.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/tanjore-painting/. देखा गया .

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Hindu History. (2026). तंजावुर चित्रकला. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/tanjore-painting/

इसकी पहचान

  1. 01

    कपड़े और चॉक के आधार वाला तख़्ता

  2. 02

    उभरा लेप-कार्य

  3. 03

    सोने का वरक़ और जड़े काँच के नग

  4. 04

    तोरण के नीचे बड़े मुख्य देवता

01नायकों से सरफ़ोजी तक

1565 में विजयनगर के पतन के बाद चित्रकार दक्षिण में तंजावुर और मदुरै के नायक दरबारों में आ गए। तंजावुर के नायकों और फिर मराठा शासकों, विशेषकर सरफ़ोजी द्वितीय (शासन 1798–1832), के समय उन्होंने पूजा-घर और महल के लिए देव-चित्र बनाए। चित्रकार तेलुगु क्षेत्र से आए राजू और नायडू समुदायों के थे। ये चित्र पहले पूजा के लिए थे, और आज भी तमिलनाडु के अनेक घरों के पूजा-स्थानों में टँगे हैं।

02लेप, सोना और नग

कटहल या सागौन के तख़्ते पर कपड़ा चढ़ाकर चॉक और गोंद का लेप किया जाता है। रेखांकन के बाद गहने, मुकुट, स्तम्भ और तोरण गाढ़े लेप से उभारे जाते हैं। उभरे भागों पर सोने का वरक़ बिछाकर काँच के मनके या नग जड़े जाते हैं। शेष भाग गहरे सपाट रंगों में रँगा जाता है: गहरा लाल, हरा और नीला। आकृतियाँ गोल मुख वाली होती हैं, मुख्य देवता आसपास के पात्रों से बहुत बड़े, और तोरण या परदे से घिरे।

03आज

तंजावुर चित्र आज भी तंजावुर, तिरुचिरापल्ली, कुम्भकोणम और चेन्नई में बनते हैं, अब प्रायः 22 कैरेट सोने के वरक़ और अर्ध-कीमती नगों से। तंजावुर महल की कला दीर्घा और चेन्नई के राजकीय संग्रहालय में पुराने उत्कृष्ट चित्र हैं। शुरुआत तंजावुर के मराठा महल परिसर से करें, जहाँ सरफ़ोजी द्वितीय द्वारा समृद्ध किया गया सरस्वती महल पुस्तकालय भी है। तंजावुर नगर में चित्रकार आज भी घरों में बने कक्षों में काम करते हैं, और कई लेप उभारने की विधि दिखा देते हैं।

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