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“मैसूर चित्रकला.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/mysore-painting/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). मैसूर चित्रकला. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/mysore-painting/
इसकी पहचान
- 01
सोने के वरक़ के साथ हल्का उभार
- 02
सौम्य, कोमल रंग
- 03
श्रीतत्त्वनिधि की प्रतिमा-विद्या
- 04
हाथ से पिसे प्राकृतिक रंग
01विजयनगर के उत्तराधिकारी
विजयनगर के भित्तिचित्र, जैसे लेपाक्षी मंदिर की छत, बताते हैं कि मैसूर चित्रकला कहाँ से आई। 1565 के बाद साम्राज्य के चित्रकारों को श्रीरंगपट्टन में राजा वोडेयर के यहाँ आश्रय मिला, और उनके परिवार इस वंश के साथ रहे। इसका स्वर्णयुग कृष्णराज वोडेयर तृतीय (शासन 1799–1868) के समय आया, जो विद्वान राजा थे और जिन्होंने ‘श्रीतत्त्वनिधि’ संकलित करवाया: देवताओं, नवग्रहों आदि के रूपों का विशाल सचित्र विश्वकोश, हर रूप के सटीक निर्देशों सहित।
02हल्का लेप-कार्य
आधार कपड़े या लकड़ी पर चिपका काग़ज़ होता है। ज़िंक ऑक्साइड और गोंद का लेप, गेसो, पतला लगाकर आभूषण उभारे जाते हैं और उन पर सोने का वरक़ बिछता है; उभार तंजावुर से बहुत कम होता है। चित्रकार खनिजों और वनस्पतियों से स्वयं रंग पीसते थे और गिलहरी के बालों की बारीक कूचियाँ बरतते थे। मुख कोमल, रंग सौम्य, और विषय राम-राज्याभिषेक और कृष्णलीला से लेकर मैसूर राजाओं की कुलदेवी चामुण्डेश्वरी तक।
03कहाँ देखें
मैसूरु के जगनमोहन महल की कला दीर्घा में सबसे बड़ा संग्रह है, और मैसूरु महल की दीवारों पर भी चित्र हैं, जिनमें दशहरा जुलूस भी है। बेंगलूरु का कर्नाटक चित्रकला परिषत् भी पुराने चित्र रखता है और यह कला सिखाता है। मैसूरु दशहरे के समय महल रात में जगमगाता है, और ये चित्र उस यात्रा का अंग होते हैं। मैसूरु में कुछ परिवार आज भी पुराने ढंग से, अपने रंग स्वयं पीसकर, चित्र बनाते हैं।



