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“पाल पाण्डुलिपि चित्रकला.” Hindu History, 2026, https://www.hinduhistory.in/hi/kala/pala-manuscripts/. देखा गया .
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Hindu History. (2026). पाल पाण्डुलिपि चित्रकला. प्राप्त , स्रोत: https://www.hinduhistory.in/hi/kala/pala-manuscripts/
इसकी पहचान
- 01
छोटे चित्र-फलकों वाले ताड़पत्र
- 02
चित्रित काष्ठ-आवरण
- 03
लाल पृष्ठभूमि पर देवता
- 04
लघु रूप में अजन्ता जैसी बहती रेखा
01महाविहारों की पुस्तकें
धर्मपाल से आगे के पाल राजाओं ने नालन्दा को दान दिए और विक्रमशिला तथा ओदन्तपुरी स्थापित किए। वहाँ लिपिक बौद्ध ग्रन्थों, सबसे अधिक अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता, की प्रतियाँ ताड़पत्र की लम्बी पट्टियों पर बनाते थे, और चित्रकार पाठ के बीच दो-तीन इंच ऊँचे छोटे फलक बनाते थे: बुद्ध का जीवन, और तारा तथा प्रज्ञापारमिता जैसे देवता। सबसे पुरानी तिथि वाली प्रति, जो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पुस्तकालय में है, किसी राजा महीपाल के पाँचवें वर्ष में लिखी गई, सम्भवतः लगभग 985 ई. में।
02रेखा और रंग
चित्रकारों ने लघु रूप में अजन्ता की कोमल, बहती रेखा अपनाई: आकृतियाँ लाल या काली रेखा से बनाकर लाल, पीले, नीले, हरे और सफ़ेद खनिज रंगों से सपाट भरी जातीं। देवता देवालयों में या कमल पर बैठे हैं, अक्सर लाल पृष्ठभूमि पर। पुस्तकों के काष्ठ-आवरण भी चित्रित होते थे। पाण्डुलिपियों को पवित्र वस्तु माना जाता था; प्रज्ञापारमिता को पढ़ना और उसकी प्रति बनाना स्वयं पुण्य था।
03अन्त और आगे की यात्रा
लगभग 1200 में बख़्तियार ख़िलजी की सेना ने ओदन्तपुरी और बिहार के महाविहारों को लूटा; मिन्हाज-उस-सिराज की तबक़ात-ए-नासिरी लिखती है कि मुण्डित सिर वाले निवासी मार दिए गए और वहाँ पुस्तकों का बड़ा भण्डार मिला जिसे पढ़ने वाला कोई जीवित नहीं बचा। भिक्षु जितनी पाण्डुलिपियाँ ले जा सके, उन्हें लेकर नेपाल और तिब्बत भागे, और पाल शैली नेपाली चित्रकला में जीवित रही। आज इसके पत्र बिखरे हैं: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पुस्तकालय, ब्रिटिश लाइब्रेरी, कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी, और पटना तथा विदेश के संग्रहालय।




