01सती की उँगलियाँ
दक्ष के यज्ञ के बाद जब भगवान शिव सती का शरीर लेकर लोकों में घूमे, तो भगवान विष्णु के सुदर्शन ने उसके खण्ड किए, और जहाँ-जहाँ अंग गिरे, वहाँ पीठ बने। पीठनिर्णय कालीघाट में दाहिने पैर की उँगलियों का गिरना बताता है; यहाँ देवी कालिका हैं और भैरव नकुलेश्वर, जिनका मन्दिर पास ही है। काली की प्रतिमा काले कसौटी पत्थर की है, तीन बड़े नेत्र, सोने की लम्बी बाहर निकली जिह्वा और सोने के चार हाथ। कभी नदी तट पर जंगल के बीच एक छोटी कुटिया में इनकी पूजा होती थी।
021809 का मन्दिर
वर्तमान मन्दिर बंगाली आटचाला शैली का है, आठ ढलानों वाली घुमावदार छत, जिसे बरिशा के सावर्ण राय चौधरी ज़मींदारों ने बनवाया और जो 1809 में पूर्ण हुआ। इसके चारों ओर वह बाज़ार बसा जहाँ 19वीं शताब्दी में चित्रकार कालीघाट पट बनाते थे: देवताओं के तेज़, साहसी जलरंग चित्र जो तीर्थयात्रियों को बिकते थे और अब संग्रहालयों की निधि हैं। कार्तिक अमावस्या की काली पूजा पर पूरा नगर रात भर यहाँ उमड़ता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1809सावर्ण राय चौधरी परिवार द्वारा वर्तमान मन्दिर पूर्ण होता है।
कालीघाट मेट्रो स्टेशन के पास। मंगलवार, शनिवार और अमावस्या को सबसे अधिक भीड़; द्वार पर दलालों से सावधान रहें।




