01घुश्मा के सौ लिंग
शिव पुराण बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन यहीं पूरा करता है। देवगिरि क्षेत्र की भक्त स्त्री घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव लिंग बनाती, उनकी पूजा करती और सरोवर में विसर्जित करती थी। उसकी बड़ी बहन सुदेहा ने ईर्ष्या में घुश्मा के पुत्र को मारकर उसी सरोवर में फेंक दिया। घुश्मा ने पूजा नहीं छोड़ी। जब वह लिंग विसर्जित करने जल के पास गई, उसका पुत्र जीवित बाहर आया और शिव उसके सामने प्रकट हुए। उसके आग्रह पर वे वहीं रहे और उसी का नाम लिया: घुश्मेश्वर, जिसे आज घृष्णेश्वर कहते हैं। स्त्रियाँ आज भी यहाँ संतान और उसकी रक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं।
02दो बार गिरा, दो बार उठा
वेरूळ देवगिरि के यादव राज्य में था, जो 1296 से 1318 के बीच दिल्ली सल्तनत के हाथ गिरा, और उन युद्धों में मंदिर को क्षति पहुँची। 16वीं शताब्दी में वेरूळ के पाटिल और छत्रपति शिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने इसे फिर बनवाया; भोसले परिवार का पुराना ठिकाना इसी गाँव में है। लंबे मुगल–मराठा युद्धों में मंदिर फिर क्षतिग्रस्त हुआ। आज का मंदिर, लाल बेसाल्ट का, पाँच तल वाले शिखर और विष्णु अवतारों की नक्काशी वाली दीवारों सहित, 18वीं शताब्दी में इन्दौर की अहिल्याबाई होलकर ने फिर बनवाया, जिन्होंने काशी विश्वनाथ और सोमनाथ का भी जीर्णोद्धार कराया।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1296–1318देवगिरि राज्य दिल्ली सल्तनत के हाथ गिरा; इन युद्धों में मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ।
- 16वीं शताब्दीशिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने मंदिर फिर बनवाया।
- 18वीं शताब्दीअहिल्याबाई होलकर ने मंदिर को वर्तमान लाल पत्थर के रूप में फिर बनवाया।
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) से लगभग 30 किमी और एलोरा गुफाओं से 1 किमी। पुरानी परंपरा से पुरुष गर्भगृह में बिना कुर्ते के जाते हैं।





