आज भी खड़ा

माँ बिरजा मन्दिर, जाजपुर

वैतरणी तट पर बिरजा क्षेत्र, शक्तिपीठों में एक, जहाँ देवी द्विभुजा महिषमर्दिनी रूप में खड़ी हैं। जाजपुर नाभि गया भी है, जहाँ गया की ही तरह पितरों को पिण्ड दिया जाता है।

निर्माण: प्राचीन पीठ; वर्तमान मन्दिर 13वीं शताब्दी ई.स्थान: ओडिशादेवता: देवी बिरजा (विरजा), द्विभुजा महिषमर्दिनी20.85° N, 86.34° E
  1. 8वीं–9वीं शताब्दी
  2. 13वीं शताब्दी
चित्र: Odisha1 · CC BY-SA 3.0

01गयासुर की नाभि

गया माहात्म्य कहता है कि जब गयासुर देवताओं के यज्ञ के लिए लेटा, तो उसका सिर गया में, नाभि जाजपुर में और पैर पीठापुरम में थे। इसलिए जाजपुर नाभि गया है, और परिवार मन्दिर परिसर के एक कूप पर श्राद्ध करते हैं। महाभारत वैतरणी को उन तीर्थों में गिनता है जहाँ पाण्डव गए। माँ बिरजा की पीठ अत्यन्त प्राचीन है: 8वीं–9वीं शताब्दी में भौम-कर राजा विरजा से, जैसा जाजपुर तब कहलाता था, राज करते थे।

02देवी और उनका उत्सव

प्रतिमा अनोखी है: देवी के केवल दो हाथ हैं, एक में भाला जो महिषासुर में धँसा है, दूसरे से वे उसकी पूँछ खींच रही हैं, और नीचे सिंह है। उनका बड़ा उत्सव दुर्गा पूजा है, जब नवरात्र के नौ दिन वे सिंहध्वज रथ पर अपनी अलग रथ यात्रा में निकलती हैं। वर्तमान मन्दिर भवन 13वीं शताब्दी का है, जो कई छोटे मन्दिरों वाले बड़े प्राचीरबद्ध परिसर में है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 8वीं–9वीं शताब्दीविरजा (जाजपुर) भौम-कर राजाओं की राजधानी है।
  2. 13वीं शताब्दीवर्तमान मन्दिर बनता है।
दर्शन और यात्रा

जाजपुर रोड स्टेशन लगभग 30 किमी दूर है। नवरात्र में सबसे अधिक भीड़ रहती है; श्राद्ध कर्म प्रायः हर दिन होते हैं।