आज भी खड़ा

ओंकारेश्वर

नर्मदा के बीच मान्धाता द्वीप पर स्थित ज्योतिर्लिंग, जिसका आकार ऊपर से ॐ जैसा बताया जाता है। आदि शंकराचार्य को यहीं अपने गुरु मिले।

निर्माण: अति प्राचीन धाम; वर्तमान मन्दिर अधिकतर परमार काल और उसके बाद केस्थान: मध्य प्रदेश (खण्डवा, मान्धाता द्वीप)देवता: भगवान शिव, ओंकारेश्वर और ममलेश्वर (अमरेश्वर) रूप में22.25° N, 76.15° E
  1. 2023
चित्र: Bernard Gagnon · CC BY-SA 3.0

01नर्मदा पर ॐ

शिव पुराण इस स्थान की दो कथाएँ देता है। एक में विन्ध्य पर्वत ने यहाँ ऐसा तप किया कि महादेव प्रकट हुए और वर दिया; लिंग दो भागों में प्रकट हुआ, द्वीप पर ओंकारेश्वर और दक्षिण तट पर ममलेश्वर, जिन्हें अमरेश्वर भी कहते हैं। तीर्थयात्री दोनों के दर्शन करते हैं, क्योंकि यह ज्योतिर्लिंग दो रूपों में एक ही गिना जाता है। दूसरी कथा में इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धाता ने द्वीप पर तप किया, जो उन्हीं के नाम से जाना जाता है। कहते हैं नर्मदा का हर कंकड़ शंकर है; महीनों तक दोनों तटों पर चलने वाली नर्मदा परिक्रमा यहाँ से होकर जाती है।

02शंकर के गुरु

शंकर दिग्विजय बताता है कि बाल-संन्यासी शंकर केरल के कालडी से पैदल चलकर नर्मदा तट पर आए और यहाँ एक गुफा में गौड़पाद के शिष्य गोविन्द भगवत्पाद से मिले। गोविन्द ने उन्हें शिष्य बनाया और उपनिषदों का अद्वैत सिखाया। द्वीप पर एक गुफा आज भी वह स्थान बताई जाती है। 2023 में मध्य प्रदेश सरकार ने मान्धाता पर्वत पर बाल शंकराचार्य की 108 फ़ुट ऊँची एकात्मता की प्रतिमा का अनावरण किया।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 2023मान्धाता पर आदि शंकराचार्य की 108 फ़ुट ऊँची एकात्मता की प्रतिमा का अनावरण।
दर्शन और यात्रा

गोमुख घाट से पुल या नाव से द्वीप पर जाएँ; दक्षिण तट पर ममलेश्वर के दर्शन भी करें। द्वीप की परिक्रमा लगभग 7 किलोमीटर की है।