आज भी खड़ा

बैद्यनाथ धाम, देवघर

वह ज्योतिर्लिंग जिसे रावण लंका ले जाना चाहता था, और वह शक्तिपीठ भी जहाँ सती का हृदय गिरा। सावन में लाखों काँवड़िये सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर नंगे पाँव यहाँ आते हैं।

निर्माण: प्राचीन धाम; मुख्य मन्दिर उत्तर-मध्यकालीनस्थान: झारखण्ड (देवघर)देवता: भगवान शिव, वैद्यनाथ रूप में; जय दुर्गा (शक्तिपीठ)24.49° N, 86.70° E
चित्र: Pinakpani · CC BY 4.0

01रावण का लिंग

रावण ने कैलास पर तप किया और एक-एक कर अपने सिर अग्नि में अर्पित किए। शिव प्रसन्न हुए, उसे स्वस्थ किया, इसीलिए वे वैद्यनाथ हैं, और उसे लंका ले जाने के लिए लिंग दिया, इस शर्त के साथ कि मार्ग में वह भूमि को न छुए। देवताओं ने वरुण को रावण के उदर में भेजा; लघुशंका से विवश रावण ने लिंग एक ग्वाले को थमा दिया, जो छद्म वेश में भगवान विष्णु थे, और ग्वाले ने उसे नीचे रख दिया। फिर लिंग कभी नहीं हिला। देवघर को हृदय पीठ भी माना जाता है, जहाँ सती का हृदय गिरा; इसलिए उसी प्रांगण में जय दुर्गा का मन्दिर है, जो पवित्र धागे से शिव के शिखर से बँधा रहता है।

02श्रावणी मेला

पूरे सावन भर केसरिया वस्त्रों में काँवड़िये बिहार के सुल्तानगंज में गंगा से जल भरते हैं और बाँस की काँवड़ पर लगभग 105 किलोमीटर देवघर तक ले जाते हैं; जल भूमि पर कभी नहीं रखा जाता। सबसे तेज़ चलने वाले डाक बम बिना रुके दौड़ते हैं। यह जल बाबा बैद्यनाथ पर चढ़ता है। कुछ परम्पराएँ वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को महाराष्ट्र के परली में मानती हैं; दोनों अपने भक्तों के लिए पूज्य हैं। यात्रा पूरी करने के लिए लगभग 45 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ के दर्शन किए जाते हैं।

दर्शन और यात्रा

सावन (जुलाई–अगस्त) में भारी भीड़ रहती है; पंक्ति में घण्टों लग सकते हैं। निकटतम हवाई अड्डा देवघर है; रेलवे जंक्शन जसीडीह है।